लेखक। अज़हर उमरी
हज़रत अली (रज़ि.) की शहादत की शुरुआत का दर्दनाक दिन
इस्लामी इतिहास में 19 रमज़ान का दिन अत्यंत दुखद और महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन Hazrat Ali ibn Abi Talib को कूफ़ा की मस्जिद में फ़ज्र की नमाज़ के दौरान ज़हरीली तलवार से हमला किया गया था। इस घटना को “शब-ए-ज़रबत” कहा जाता है, जिसका अर्थ है — वह रात जब हज़रत अली (रज़ि.) पर वार किया गया।
हज़रत अली (रज़ि.) का परिचय
हज़रत अली इब्न अबी तालिब इस्लाम के चौथे खलीफ़ा, पैग़म्बर-ए-इस्लाम Prophet Muhammad (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के चचेरे भाई और दामाद थे। आपने बचपन में ही इस्लाम कबूल किया और पूरी ज़िंदगी इस्लाम की सेवा, न्याय और बहादुरी के लिए समर्पित कर दी।
आपको इल्म, शुजाअत (बहादुरी), इंसाफ़ और तक़वा का प्रतीक माना जाता है। इस्लामी इतिहास में आपका स्थान अत्यंत सम्मानित है।
शब-ए-ज़रबत की घटना
19 रमज़ान 40 हिजरी की सुबह जब हज़रत अली (रज़ि.) Great Mosque of Kufa में फ़ज्र की नमाज़ पढ़ाने के लिए पहुँचे, तभी एक व्यक्ति Abd al-Rahman ibn Muljam ने ज़हर में बुझी तलवार से उन पर हमला कर दिया।
हमले के बाद हज़रत अली (रज़ि.) ने कहा:
“फुज़्तु व रब्बिल काबा”
अर्थात — “काबा के रब की क़सम, मैं कामयाब हो गया।”
इस वार के बाद दो दिनों तक आप ज़ख्मों से जूझते रहे और 21 रमज़ान को आपकी शहादत हो गई।
शब-ए-ज़रबत का महत्व
मुसलमान इस रात को गहरे ग़म और इबादत के साथ याद करते हैं। कई जगहों पर मजलिसें आयोजित होती हैं, जिनमें हज़रत अली (रज़ि.) की ज़िंदगी, उनके न्याय, साहस और इस्लाम के लिए कुर्बानियों को याद किया जाता है।
हज़रत अली (रज़ि.) की शिक्षाएँ
हज़रत अली (रज़ि.) की ज़िंदगी इंसानियत के लिए एक आदर्श है। उन्होंने हमेशा:
न्याय और सत्य का साथ दिया
गरीबों और मज़लूमों की मदद की
ज्ञान और शिक्षा को महत्व दिया
भाईचारे और इंसाफ़ का संदेश दिया
19 रमज़ान की शब-ए-ज़रबत हमें यह याद दिलाती है कि सत्य और न्याय के मार्ग पर चलने वाले महान व्यक्तित्वों ने मानवता के लिए कितनी बड़ी कुर्बानियाँ दीं। हज़रत अली (रज़ि.) का जीवन और उनकी शहादत पूरी दुनिया के लिए साहस, न्याय और आध्यात्मिकता का अमर संदेश है।

