उत्तर प्रदेश

हिन्दुस्तान कॉलेज में ‘लिक्विड बायोफर्टिलाइजर उत्पादन तकनीक एवं सतत कृषि में इसके लाभ’ पर अतिथि व्याख्यान आयोजित

आगरा। शारदा ग्रुप के प्रतिष्ठित संस्थान हिन्दुस्तान कॉलेज ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी को जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा लिक्विड बायोफर्टिलाइजर उत्पादन तकनीक एवं सतत कृषि में इसके लाभविषय पर एक अतिथि व्याख्यान का आयोजन किया गया। व्याख्यान डॉ हरि माधय शुक्ला, पूर्व प्रबंधक, बायोफर्टिलाइजर प्रोडक्शन यूनिट इफको फूलपुर, प्रयागराज द्वारा दिया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ कॉलेज के निदेशक डॉ. आर एस पवित्र, संस्थान के आई. क्यू.ए.सी निदेषक डॉ. हरेंद्र सिंह चौहान, डीन आर एण्ड की प्रो. एम. एस. गौर और इनोवेशन एवं इनक्यूबेशन सेल के प्रमुख डॉ. विनोद कुमार कुशवाह की गरिमामयी उपस्थिति में हुआ।

संस्थान के निदेषक डी. आर. एस. पवित्र एवं बायोटेक्नोलॉजी के विभागाध्यक्ष डॉ अरुण प्रसाद चोपड़ा ने कार्यक्रम के मुख्यअतिथि डॉ. हरि माधव शुक्ला की पौधा एवं शॉल ओढ़ाकर स्वागत किया और कहा कि जेय आधारित कृषि को बढ़ावा देने की अत्यंत आवष्यकता है क्योंकि रासायनिक खाद तथा कीटनाषक मानव स्वास्थ्य एवं पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। जिसका हम प्राकृतिक खेती के उत्पादों एवं तकनीकी से कम कर सकते हैं।

इस अवसर पर डी हरि माधय शुक्ला ने अपने व्याख्यान में लिक्विड बायोफर्टिलाइजर उत्पादन तकनीक के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि जैविक खादों का प्रयोग रासायनिक उर्वरकों की तुलना में अधिक पर्यावरण हितैषी होता है और यह मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने में सहायक होता है। उन्होंने बाइ‌जोबियम, एजोटोबैक्टर, फास्फेट सोल्यूबिलाइजिंग बैक्टीरिया (ष्ठ) एवं पोटाश मोबिलाइजिंग बैक्टीरिया (ज्ञराठ) जैसे प्रमुख जैय उर्वरकों के उपयोग एवं उनकी उत्पादन विधियों की विस्तृत जानकारी प्रदान की।

उन्होंने यह भी बताया कि तरल जैव उर्वरक (स्युनपका उपवमितजपसप्रमत) ठोस जैव उर्वरकों की तुलना में अधिक प्रभावी होते हैं, क्योंकि वे अधिक समय तक जीवित रहते हैं, उपयोग में आसान होते हैं और लंबे समय तक मिट्टी में अपनी सक्रियता बनाए रखते हैं।

डॉ. शुक्ला ने सतत कृषि प्रणाली निजपदंइसम । हत्तपबनसजनतम) में जैव उर्वरकों की भूमिका पर भी प्रकाश डाला और बताया कि किसानों को अधिक से अधिक गुणवत्ता को जैव उर्वरकों का उपयोग करके मृदा की उर्वरता और फसल उत्पादन को बढ़ावा देना चाहिए।

जैव उर्वरक ऐसे पदार्थ होते है जिसमें सूक्ष्मजीव होते हैं जिन्हें मिट्टी में मिलाने पर फसल की पैदावार बढ़ती है और पौधों की वृद्धि को बढ़ावा मिलता है। जैव उर्वरकों के उत्पादन के उपयोग, उपयोगी जीवाणुओं के पृथक्कीकरण शुद्धीकरण कैरेक्टराइजेशन जेनरेशन एवं उनका जनक जीवाणु तैयार कर खेती में बोई जाने वाली फसलों में प्रयोग करना है। ये सभी जीवाणु पर्यावरणीय जीवाणु होते हैं जो फसल को सभी तरह के पोषक तत्वों की उपलब्धता में वृद्धि करते है। साधारण रूप में सही विधि के जैव उर्वरकों का प्रयोग करवो रासायनिक खादों वो प्रयोग में आधी मात्रा की कमी के साथ-साथ ही अधिक उपज जिसमें 10 से 20 प्रतिषत ज्यादा तथा अधिक गुणवत्ता के साथ उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। जैव उर्वरक कार्बनिक खेती के एक अच्छे अपघटक के रूप में जाने जाते हैं। मृदा स्वास्थ वृध्दि के लिए यह जीवाणु लाभकारी होते हैं तथा मृदा जनित रोग नाषक जीवाणु अधिक संस्था में उपयुक्त होते हैं।

उन्होंने बताया कि इन जीवाणुओं के द्वारा वृद्धि कारक हार्मोन्स रिसाव के साथ एंटिफंगल या एंटीबैक्टीरियल रसायनों का रिसाव करते हैं परिणामतय, फसलों में बैक्टीरियल फंगल एवं वायरस जनित रोगों से बचाव भी होता है। नील हरित शैवाल धान की फसलों में जैव उर्वरक के रूप में प्रयोग करने से मृद्धा में जीवांश की मात्रा में वृद्धि के साथ साथ 25 से 30 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की पूर्ति भी हो जाती है। इस तरह सही ढंग से सही उपयुक्त जीव उर्वरकों का फसलों में प्रयोग करते हुए 25 से 30 प्रतिषत खेती की लागत के उर्वरकों में कमी करते हुए 10 से 20 प्रतिषत उपज की वृद्धि किसान माई पा सकते हैं। नाइट्रोजन की पूर्ति के लिए दलहनी फसलों राइजोबियम एवं अन्य रवी एवं खरीफ खाद्यान्न, सब्जी, तिलहनी, फसलों में ऐजेटोबेक्टर ऐजोस्पाइरलम एवं ऐसिटोबेक्टर जैसे जैव उर्वरकों का प्रयोग करना अधिक लाभकारी होता है। अन्य तत्वों जैसे फास्फोरस, पोटाष एवं जिंक आदि की उपलब्धता बढ़ाने के लिए सम्बंधित जैव उर्वरकों का प्रयोग कर सकते हैं। अतः यह कह सकते हैं कि ये सभी जैव उर्वरक पर्यावरणीय मित्र, प्रदूषण मुक्त, मृदा संजीवनी, सस्ते एवं इनका प्रयोग करना आसान है।

इस व्याख्यान में हिन्दुस्तान कॉलेज के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के 30 छात्रों के साथ-साथ आर. बी. एस. कॉलेज, आगरा के फार्मेसी विभाग के 5 छात्रों ने भी भाग लिया। उपस्थित शिक्षकों में

वीरेन्द्र सिंह श्रीमती शिवि शर्मा, श्री रितेश कुमार चौहान, सुश्री ममता साहनी एवं श्री रजत कुमार विमल शामिल रहे।

कार्यक्रम का सफल संचालन बायोटेक्नोलॉजी की तृतीय वर्ष की छात्रा ईषा सिंह एवं श्रुत्ति अग्रवाल ने किया एवं कार्यक्रम के अंत में श्री विपिन कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया और कहा कि इस तरह के व्याख्यान केवल छात्रों के ज्ञानवर्धन में सहायक होते हैं बल्कि उन्हें व्यावहारिक रूप से सतत कृषि पद्धतियों को समझने का अवसर भी प्रदान करते हैं।