पत्नी कैंसर की गंभीर अवस्था में, जमीयत उलेमा-ए-महाराष्ट्र की कानूनी सहायता समिति ने की पैरवी
नई दिल्ली,। टाडा (TADA) कानून के तहत उम्रकैद की सजा काट रहे मुस्लिम कैदी अशफाक को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। पिछले 32 वर्षों से जयपुर सेंट्रल जेल में बंद अशफाक को सुप्रीम कोर्ट ने अपनी कैंसर से जूझ रही पत्नी की देखभाल और इलाज में मदद के लिए दो सप्ताह की इमरजेंसी पैरोल पर रिहा करने का आदेश दिया है।
अशफाक की पैरोल याचिका पहले जयपुर हाईकोर्ट में दाखिल की गई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने यह कहते हुए राहत देने से इनकार कर दिया था कि उनकी पत्नी की देखभाल के लिए उनके बच्चे मौजूद हैं। इसके बाद अशफाक के परिवार ने जमीयत उलेमा-ए-महाराष्ट्र (ارشد مدنی) लीगल एड कमेटी से संपर्क किया।
परिवार की अपील पर जमीयत उलेमा-ए-महाराष्ट्र के अध्यक्ष मौलाना हलीमुल्लाह कासमी ने मानवीय आधार पर मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाने का निर्णय लिया।
जमीयत की कानूनी सहायता समिति की ओर से एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड चांद कुरैशी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की, जबकि एडवोकेट मुजाहिद अहमद ने चार सुनवाइयों के दौरान अशफाक की ओर से दलीलें पेश कीं।
पत्नी कैंसर की गंभीर अवस्था में
सुप्रीम कोर्ट में दलील दी गई कि अशफाक की पत्नी कैंसर की पांचवीं स्टेज से जूझ रही हैं और इस कठिन समय में उनके पति की मौजूदगी उनके लिए भावनात्मक और व्यावहारिक रूप से महत्वपूर्ण है। अदालत को यह भी बताया गया कि अशफाक को पूर्व में पैरोल मिली थी और उन्होंने इसका दुरुपयोग नहीं किया था तथा निर्धारित समय पर जेल में आत्मसमर्पण कर दिया था।
सरकारी वकील ने पैरोल का विरोध करते हुए कहा कि अशफाक की पत्नी की देखभाल के लिए उनके बच्चे मौजूद हैं। साथ ही यह भी दलील दी गई कि अशफाक को टाडा कानून के तहत उम्रकैद की सजा मिली है।
सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय आधार पर दी राहत
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने अशफाक को दो सप्ताह की इमरजेंसी पैरोल पर रिहा करने का आदेश दिया।
अदालत ने कहा कि घर में बच्चों की मौजूदगी अपने आप में पैरोल की मांग खारिज करने का आधार नहीं हो सकती। गंभीर बीमारी से जूझ रही पत्नी के दौरान पति की मौजूदगी उसे भावनात्मक सहारा दे सकती है और पति उसके इलाज एवं अन्य आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं में मदद कर सकता है।
हालांकि, अदालत ने पैरोल के दौरान अशफाक को हर तीसरे दिन संबंधित पुलिस स्टेशन में हाजिरी लगाने का निर्देश दिया है।
सज़ा में कमी की मांग भी हो चुकी है खारिज
बताया गया है कि टाडा कानून के तहत उम्रकैद की सजा पाए अशफाक और उनके अन्य साथियों की सजा में कमी यानी रिमिशन की मांग सरकार के स्तर पर भी खारिज की जा चुकी है। ऐसे में पैरोल ही उनके लिए जेल से अस्थायी राहत पाने का प्रमुख कानूनी रास्ता रह जाता है।
अशफाक के मामले में सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश ऐसे समय आया है जब उनकी पत्नी गंभीर बीमारी से जूझ रही हैं। जमीयत उलेमा-ए-महाराष्ट्र की कानूनी सहायता समिति ने इसे मानवीय आधार पर मिली महत्वपूर्ण राहत बताया है।
— TIMES OF TAJ
