रोमांस, अंदाज़ और अभिनय का वह नाम जिसे हिंदी सिनेमा ने ‘सदाबहार’ कहकर याद किया
लेखक – अज़हर उमरी
हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जो पर्दे पर आते हैं, दर्शकों के दिलों में जगह बनाते हैं और फिर हमेशा के लिए यादों का हिस्सा बन जाते हैं। देव आनंद ऐसे ही सदाबहार अभिनेता थे, जिनका नाम आते ही एक खास मुस्कान, तेज संवाद अदायगी, स्टाइलिश अंदाज़ और रोमांटिक नायक की छवि आंखों के सामने उभर आती है।
26 सितंबर 1923 को जन्मे देव आनंद का पूरा नाम धर्मदेव पिशोरीमल आनंद था। उनका फिल्मी सफर 1940 के दशक से शुरू होकर 2011 तक चला। छह दशक से अधिक लंबे इस सफर में उन्होंने अभिनेता के साथ-साथ निर्माता और निर्देशक के रूप में भी अपनी अलग पहचान बनाई।
‘देव साहब’ बनने की कहानी
देव आनंद का शुरुआती दौर आसान नहीं था। लेकिन उनमें आगे बढ़ने की ऐसी जिद थी जिसने उन्हें हिंदी सिनेमा के सबसे पहचाने जाने वाले सितारों में शामिल कर दिया।
फिल्म ‘जिद्दी’ (1948) ने उनके करियर को महत्वपूर्ण गति दी। इसके बाद ‘बाजी’, ‘जाल’, ‘टैक्सी ड्राइवर’, ‘काला पानी’, ‘काला बाजार’ जैसी फिल्मों ने उन्हें दर्शकों के बीच लोकप्रिय बना दिया। उनकी फिल्मों में अपराध, रोमांस, सामाजिक सरोकार और जीवन के बदलते रंग दिखाई देते थे।
‘गाइड’ ने बदल दी पहचान
देव आनंद के करियर की सबसे चर्चित फिल्मों में ‘गाइड’ (1965) का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। आर.के. नारायण के उपन्यास पर आधारित इस फिल्म में देव आनंद ने राजू का किरदार निभाया।
‘गाइड’ केवल एक प्रेम कहानी नहीं थी। इसमें रिश्तों, महत्वाकांक्षा, आत्मसंघर्ष और आध्यात्मिक परिवर्तन जैसे विषयों को भी जगह मिली। फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली और यह ऑस्कर के लिए विदेशी भाषा की फिल्म की श्रेणी में नामांकित हुई।
स्टाइल जो उनकी पहचान बन गया
देव आनंद की लोकप्रियता केवल उनके अभिनय तक सीमित नहीं थी। उनका पहनावा, चलने का अंदाज़, सिर हिलाकर संवाद बोलना और तेज गति से संवाद अदायगी—सब कुछ उनकी अलग पहचान बन गया।
उनका अंदाज़ इतना विशिष्ट था कि बाद की पीढ़ियों के कलाकारों और दर्शकों ने भी उसे याद रखा। यही वजह है कि दशकों बाद भी देव आनंद का नाम हिंदी सिनेमा के ‘स्टाइल आइकन’ के रूप में लिया जाता है।
अभिनेता से निर्माता और निर्देशक तक
देव आनंद सिर्फ अभिनेता बनकर संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने अपनी रचनात्मक सोच को फिल्मों के निर्माण और निर्देशन में भी उतारा। ‘प्रेम पुजारी’ से उन्होंने निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखा। आगे चलकर ‘ज्वेल थीफ’, ‘जॉनी मेरा नाम’ और ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ जैसी फिल्मों से उनका नाम फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी मजबूती से स्थापित हुआ।
पुरस्कारों ने भी किया सम्मानित
देव आनंद को उनके योगदान के लिए कई महत्वपूर्ण सम्मान मिले। उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार, पद्म भूषण और भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मानों में शामिल दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।
उनकी फिल्म ‘गाइड’ के लिए उन्हें फिल्मफेयर में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का सम्मान मिला। ‘काला पानी’ के लिए भी उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।
आखिरी दौर तक कैमरे से रिश्ता
देव आनंद ने उम्र को अपने काम के रास्ते में कभी दीवार नहीं बनने दिया। 2011 में आई ‘चार्जशीट’ उनके लंबे फिल्मी सफर की अंतिम फिल्मों में रही। उसी वर्ष 3 दिसंबर को उनका निधन हो गया।
लेकिन कलाकार का जीवन उसकी सांसों के साथ समाप्त नहीं होता। जब उसकी फिल्में देखी जाती हैं, उसके गीत सुने जाते हैं और उसके संवाद याद किए जाते हैं, तब वह किसी न किसी रूप में जीवित रहता है।
क्यों आज भी याद आते हैं देव आनंद?
देव आनंद की सबसे बड़ी खासियत शायद यही थी कि उन्होंने अपने दौर के साथ खुद को बदला, लेकिन अपनी पहचान को खोने नहीं दिया। वह केवल एक अभिनेता नहीं थे, बल्कि हिंदी सिनेमा की एक पूरी संस्कृति का हिस्सा बन गए।
उनकी फिल्मों के गीत आज भी सुनाई देते हैं, उनका पहनावा आज भी चर्चा में आता है और उनका नाम आज भी ‘सदाबहार अभिनेता’ के रूप में लिया जाता है।
देव आनंद की कहानी हमें यह भी बताती है कि लोकप्रियता केवल पर्दे की चमक से नहीं मिलती। इसके लिए वर्षों की मेहनत, जोखिम उठाने का साहस और अपनी रचनात्मक पहचान पर विश्वास जरूरी होता है।
देव आनंद चले गए, लेकिन ‘देव साहब’ का अंदाज़, उनकी फिल्में और उनकी यादें हिंदी सिनेमा के इतिहास में हमेशा जीवित रहेंगी।
लेखक – अज़हर उमरी
Times of Taj Disclaimer: यह लेख उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों और ऐतिहासिक अभिलेखों में दर्ज जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है।
