CEC की नियुक्ति से लेकर हटाने तक संवैधानिक सुरक्षा; संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत जरूरी
नई दिल्ली। भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) का पद संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण और विशेष सुरक्षा वाला पद है। केंद्र सरकार अपनी इच्छा से मुख्य चुनाव आयुक्त को सीधे पद से नहीं हटा सकती। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत CEC को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिनके तहत सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता को बनाए रखना है। मौजूदा कानून के अनुसार भी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान प्रक्रिया लागू होती है, जबकि अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश आवश्यक होती है।
कैसे शुरू होती है हटाने की प्रक्रिया?
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया संसद में प्रस्ताव के नोटिस से शुरू हो सकती है। Judges (Inquiry) Act, 1968 के तहत लोकसभा में कम से कम 100 सांसद या राज्यसभा में कम से कम 50 सांसद नोटिस पर हस्ताक्षर करें, तभी प्रस्ताव को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
नोटिस स्वीकार किए जाने के बाद तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की जाती है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या अन्य न्यायाधीशों में से एक सदस्य, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों में से एक सदस्य और एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता शामिल होता है। समिति आरोपों की जांच करती है और अपनी रिपोर्ट देती है।
यदि जांच में दुर्व्यवहार या अक्षमता साबित होती है, तो मामला संसद के सामने रखा जाता है। इसके बाद दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना आवश्यक होता है। प्रस्ताव को सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत के साथ-साथ उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई समर्थन की आवश्यकता होती है।
दोनों सदनों से प्रस्ताव पारित होने के बाद उसे राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। राष्ट्रपति के आदेश से मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाया जाता है।
इतिहास में हुईं कोशिशें
भारत के चुनावी इतिहास में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का मुद्दा पहले भी राजनीतिक और संसदीय बहस का विषय रहा है। 1990 के दशक में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन को हटाने की मांग उठी थी। बाद के वर्षों में भी चुनाव आयुक्तों को हटाने या उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर विवाद सामने आए।
2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश की थी। तत्कालीन केंद्र सरकार ने उस सिफारिश को स्वीकार नहीं किया।
यह घटनाक्रम यह स्पष्ट करता है कि चुनाव आयोग से जुड़े पदों पर कार्रवाई के लिए संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
सरकार के लिए भी सीधे हटाना संभव नहीं
मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति और सेवा शर्तों से संबंधित वर्तमान व्यवस्था Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023 में निर्धारित है। कानून के अनुसार CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक, जो पहले हो, निर्धारित है।
हालांकि CEC को हटाने के मामले में संसद की भूमिका निर्णायक है। संविधान ने इसके लिए ऐसी प्रक्रिया निर्धारित की है जिसमें केवल सरकार की इच्छा के आधार पर किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाना संभव नहीं है।
मुख्य चुनाव आयुक्त के पद की संवैधानिक सुरक्षा भारतीय चुनाव व्यवस्था की स्वतंत्रता से जुड़ी हुई है। CEC को हटाने के लिए महज राजनीतिक असहमति या सरकार का निर्णय पर्याप्त नहीं है। दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर निर्धारित संसदीय प्रक्रिया, जांच और दोनों सदनों के विशेष बहुमत के बाद ही राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी कर सकते हैं।
अज़हर उमरी, वरिष्ठ पत्रकार
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