सुल्तानुल औलिया हजरत ख्वाजा सूफी मोहम्मद हसन शाह रहमतुल्लाह अलैह का 69वां सालाना उर्स 16 से 19 अक्टूबर तक
संवाद। मसूद तैमूरी
रामपुर। आज जब भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के अनेक हिस्सों में नफरत, धार्मिक कट्टरता, सांप्रदायिक तनाव, दंगे और आतंकवाद जैसी समस्याएं मानवता के सामने चुनौती बनकर खड़ी हैं, ऐसे समय में सूफी संतों की शिक्षाएं और उनकी मोहब्बत का पैगाम पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। सूफी संतों ने सदैव इंसान को इंसान से जोड़ने, आपसी मतभेद मिटाने और समाज में अमन-चैन, भाईचारे तथा एकता को मजबूत करने का संदेश दिया है। उनका मानना रहा है कि सच्ची शांति केवल भाषणों और नारों से नहीं, बल्कि दिलों में मोहब्बत पैदा करने और नेक शिक्षाओं को अपने व्यवहार में उतारने से कायम होती है।
भारत की सरजमीं पर सूफी संतों ने सदियों से गंगा-जमुनी तहजीब, धार्मिक सद्भाव और विश्वबंधुत्व की परंपरा को मजबूत किया है। इसी रूहानी परंपरा का एक महत्वपूर्ण केंद्र उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले की मिलक तहसील स्थित भैंसोड़ी शरीफ (मुर्शिद नगर) है। यह पवित्र स्थल सुल्तानुल औलिया हजरत ख्वाजा सूफी मोहम्मद हसन शाह रहमतुल्लाह अलैह की रूहानी शिक्षाओं, इंसानियत के प्रति प्रेम और भाईचारे के संदेश के लिए जाना जाता है। उनकी याद में इस वर्ष 16 से 19 अक्टूबर तक 69वां सालाना उर्स शरीफ मनाया जाएगा। उर्स को लेकर तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। देश के विभिन्न हिस्सों के साथ ही विदेशों से भी बड़ी संख्या में जायरीन के पहुंचने की उम्मीद है।
1875 में हुआ था सुल्तानुल औलिया का जन्म
रूहानी शख्सियत सुल्तानुल औलिया हजरत ख्वाजा सूफी मोहम्मद हसन शाह रहमतुल्लाह अलैह का जन्म 30 नवंबर 1875 को जिला रामपुर की मिलक तहसील के भैंसोड़ी शरीफ में हजरत रमजानी ठेकेदार रहमतुल्लाह अलैह के घर हुआ था। अपनी रूहानी शख्सियत, आध्यात्मिक साधना और इंसानियत से मोहब्बत के जरिए उन्होंने इस क्षेत्र को विशिष्ट पहचान दिलाई। उनके प्रयासों और रूहानी परंपरा के चलते भैंसोड़ी शरीफ मुर्शिद नगर के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ।
भैंसोड़ी शरीफ की सरजमीं से मोहब्बत, इंसानियत, हमदर्दी, कौमी एकता, इत्तेहाद, इत्तफाक और अमन-शांति का जो पैगाम निकला, उसने दूर-दूर तक लोगों को प्रभावित किया। यहां की पहचान केवल एक धार्मिक स्थल के रूप में ही नहीं, बल्कि पीर-मुरीद की परंपरा, आध्यात्मिक शिक्षा और आपसी प्रेम के केंद्र के रूप में भी बनी। हजरत ख्वाजा सूफी मोहम्मद हसन शाह ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि इंसान की असली पहचान उसके प्रेम, व्यवहार, विनम्रता और दूसरों के प्रति हमदर्दी से होती है।
सुल्तानुल औलिया का विसाल 8 नवंबर 1959 को हुआ।
उनके जीवन से जुड़ी शिक्षाएं और उनके अनुयायियों की आस्था आज भी इस रूहानी केंद्र की परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।
हजरत ख्वाजा सूफी अब्दुल अजीज मियां ने संभाली रूहानी विरासत

हजरत नजीर अहमद और हजरत हुसैनी बेगम साहिबा के यहां 1 जुलाई 1921 को हजरत ख्वाजा सूफी अब्दुल अजीज मियां किबला रहमतुल्लाह अलैह का जन्म हुआ। उन्हें शाने माशूकियत, राजदारे हकीकत और शहीदे मिल्लत के नाम से भी याद किया जाता है। सुल्तानुल औलिया के विसाल के बाद वह उनके उत्तराधिकारी के रूप में गद्दीनशीन हुए और सिलसिले की खिदमत करते रहे। 27 नवंबर 1971 को उनका विसाल हुआ।
हजरत ख्वाजा सूफी अब्दुल अजीज मियां ने अपने जीवनकाल में ही अपने पुत्र हजरत ख्वाजा सूफी लियाकत हुसैन शाह उर्फ मुन्ने मियां सरकार को अपना जानशीन और उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। उनके बाद परिवार की रूहानी परंपरा और दरगाह की व्यवस्थाओं को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी हजरत ख्वाजा सूफी जावेद हुसैन शाह को सौंपी गई।
मुन्ने मियां सरकार ने दुनिया भर में पहुंचाया मोहब्बत का पैगाम
हजरत ख्वाजा सूफी लियाकत हुसैन शाह उर्फ मुन्ने मियां सरकार ने वर्ष 1971 से 2007 तक रूहानी सिलसिले की खिदमत की। उनके दरबार में सभी धर्मों, जातियों और वर्गों के लोग पहुंचते रहे। उनके यहां अमीर-गरीब, ऊंच-नीच अथवा जात-पात के आधार पर कोई भेदभाव नहीं था। उन्होंने अपने प्रेम, सादगी और आध्यात्मिक शिक्षाओं से लोगों के दिलों में विशेष स्थान बनाया।
सज्जादगी की मसनद पर आसीन रहते हुए उन्होंने फकीराना, कलंदराना और शाही अंदाज के साथ रूहानी परंपरा को आगे बढ़ाया। उनके व्यक्तित्व में विनम्रता, आध्यात्मिकता और लोगों को आपस में जोड़ने की भावना प्रमुख रही। उन्होंने हसनी-अजीजी लियाकती सिलसिले की मशाल को आगे बढ़ाते हुए मोहब्बत और भाईचारे का संदेश दूर-दूर तक पहुंचाया।
18 जुलाई 2007 को उनके विसाल से उनके अनुयायियों में शोक की लहर दौड़ गई। उनके मुरीदों और चाहने वालों ने इसे एक बड़ी रूहानी क्षति के रूप में महसूस किया। इसके बाद उनके पुत्र और जानशीन हजरत ख्वाजा सूफी जावेद हुसैन शाह ने सज्जादगी की जिम्मेदारी संभाली और इस रूहानी विरासत को आगे बढ़ाने का कार्य जारी रखा।
पीर-मुरीद की परंपरा और रूहानी तालीम का केंद्र
भैंसोड़ी शरीफ (मुर्शिद नगर) गुरु-शिष्य परंपरा और सूफियाना शिक्षाओं का महत्वपूर्ण मरकज माना जाता है। सूफी परंपरा में साधक अपने पीर की सरपरस्ती और मार्गदर्शन में रहकर आत्मशुद्धि, संयम, प्रेम और ईश्वर की ओर उन्मुख होने का प्रयास करता है। इस मार्ग में केवल किताबी ज्ञान ही पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि अच्छे आचरण, सेवा, विनम्रता और अपने भीतर की बुराइयों को दूर करना भी आवश्यक समझा जाता है।
सूफी शिक्षाओं के अनुसार, जब मनुष्य अपने अहंकार, द्वेष, लालच और नफरत से ऊपर उठकर प्रेम तथा इंसानियत को अपनाता है, तभी उसके व्यक्तित्व में वास्तविक बदलाव आता है। यही वजह है कि सूफी संतों की शिक्षाएं विभिन्न समुदायों के लोगों को आपस में जोड़ने का माध्यम बनी हैं।
सुल्तानुल औलिया और उनके उत्तराधिकारियों की रूहानी परंपरा भी इसी संदेश पर आधारित रही है कि मानवता की सेवा, आपसी सम्मान और दिलों में मोहब्बत कायम करना ही जीवन की सार्थकता है। भैंसोड़ी शरीफ का उर्स इसी रूहानी विरासत को याद करने और उससे प्रेरणा लेने का अवसर है।
चार दिवसीय उर्स की तैयारियां तेज़
रामपुर जिले के भैंसोड़ी शरीफ (मुर्शिद नगर) में सुल्तानुल औलिया हजरत ख्वाजा सूफी मोहम्मद हसन शाह रहमतुल्लाह अलैह का 69वां सालाना उर्स 16 से 19 अक्टूबर तक मनाया जाएगा। उर्स की सरपरस्ती और निगरानी सज्जादानशीन हजरत ख्वाजा सूफी जावेद हसन शाह अजीजी लियाकती करेंगे। आयोजन में देश-विदेश से जायरीन के शामिल होने की संभावना है। दरगाह की ओर से कार्यक्रम की तैयारियां की जा रही हैं।
सज्जादानशीन हजरत ख्वाजा सूफी जावेद हसन शाह ने उर्स के कार्यक्रमों की जानकारी देते हुए बताया कि चार दिनों तक धार्मिक और रूहानी कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
उर्स का कार्यक्रम
16 अक्टूबर, शुक्रवार: उर्स के पहले दिन शाम पांच बजे सरकारी चादर पेश की जाएगी। रात नौ बजे मिलाद शरीफ और महफिले समां का आयोजन होगा।
17 अक्टूबर, शनिवार: दूसरे दिन शाम पांच बजे आम चादर पेश की जाएगी। रात नौ बजे शब्बेदारी और महफिले समां आयोजित होगी। इस दौरान देश के मशहूर कव्वाल अपने कलाम पेश करेंगे।
18 अक्टूबर, रविवार: तीसरे दिन सुबह 11 बजे कुल शरीफ और रंगे महफिल का आयोजन किया जाएगा। रात में मुशायरा आयोजित होगा, जिसमें शायर अपने कलाम के जरिए श्रोताओं को रूबरू कराएंगे।
19 अक्टूबर, सोमवार: उर्स के अंतिम दिन सुबह 10 बजे संदल शरीफ की रस्म अदा की जाएगी। इसके साथ ही चार दिवसीय सालाना उर्स का समापन होगा।
