बहू घर जोड़ने आती है, रिश्ते तोड़ने नहीं। जिस घर में बेटियों की हंसी, उनकी आवाजाही और उनका अपनापन खत्म होने लगे, वहां रिश्तों की अहमियत पर सवाल उठना लाजिमी है।
बेटियां किसी भी घर की रौनक होती हैं। शादी के बाद भले ही उनका घर बदल जाता है, लेकिन मायके से उनका रिश्ता कभी खत्म नहीं होता। मायका वह जगह है, जहां बेटी बिना किसी औपचारिकता के आ सकती है, अपने सुख-दुख बांट सकती है और बचपन की यादों में कुछ पल सुकून से बिता सकती है।
लेकिन अफसोस, कई परिवारों में शादी के बाद हालात ऐसे बदल जाते हैं कि बेटियों का अपने ही मायके में आना-जाना कम होने लगता है। कभी छोटी-छोटी बातों पर नाराजगी, कभी मनमुटाव, तो कभी घर की नई बहू की असहजता या विरोध के कारण परिवार के रिश्तों में दूरियां पैदा होने लगती हैं।
सवाल यह है कि आखिर एक बहू को घर की बेटियों से परेशानी क्यों होनी चाहिए?
जिस घर में बहू कदम रखती है, उस घर की बेटियां भी उसी परिवार का हिस्सा होती हैं। जिस तरह बहू अपने मायके से प्यार और सम्मान की उम्मीद करती है, उसी तरह घर की बेटियां भी अपने मायके में अपनापन चाहती हैं। अगर एक बहू अपने मायके में सम्मान चाहती है, तो उसे अपने ससुराल की बेटियों के मायके आने पर भी सम्मान और खुशी का भाव रखना चाहिए।
रिश्ते किसी एक व्यक्ति की मर्जी से नहीं चलते। परिवार में हर सदस्य का अपना स्थान होता है। बहू का सम्मान जरूरी है, लेकिन उस सम्मान के नाम पर बेटियों को उनके ही घर से दूर कर देना उचित नहीं। इसी तरह बेटियों को भी बहू की भावनाओं, निजता और अधिकारों का ख्याल रखना चाहिए।
एक अच्छे परिवार की पहचान इस बात से नहीं होती कि घर कितना बड़ा है, उसमें कितनी दौलत है या समाज में उसका कितना नाम है। असली पहचान इस बात से होती है कि उस घर में रिश्तों को कितनी इज्जत दी जाती है और परिवार के सदस्य एक-दूसरे के लिए कितनी जगह रखते हैं।
यह भी समझना जरूरी है कि हर घर में बेटियों का आना-जाना बंद होने के पीछे केवल बहू ही जिम्मेदार नहीं होती। कभी माता-पिता का व्यवहार, कभी भाइयों की बेरुखी, कभी संपत्ति का विवाद और कभी दोनों पक्षों की गलतफहमियां भी इसकी वजह बनती हैं। बिना पूरी सच्चाई जाने किसी एक व्यक्ति या पूरे खानदान को दोष देना भी उचित नहीं है।
याद रखिए, घर दीवारों से नहीं, रिश्तों से बनता है।
जो बहू अपने ससुराल की बेटियों को अपनी बहनों जैसा सम्मान देती है, वह परिवार में मोहब्बत बढ़ाती है। और जो बेटी अपनी भाभी को प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि परिवार का अहम हिस्सा समझती है, वह रिश्तों को मजबूत बनाती है।
घर की असली खूबसूरती तब है, जब बेटी मायके आने से पहले सौ बार न सोचे, बहू को अपने सम्मान की चिंता न सताए और भाई किसी एक रिश्ते को बचाने के लिए दूसरे रिश्ते की कुर्बानी न दे।
आखिरकार, आज जो बेटी अपने मायके में अपनापन तलाश रही है, कल वही किसी दूसरे घर की बहू होगी। इसलिए रिश्तों में वही व्यवहार अपनाइए, जिसकी उम्मीद आप अपने लिए करते हैं।
क्योंकि जिस घर में बेटियों के कदम रुक जाते हैं, वहां केवल आवाजाही नहीं रुकती, कई बार खुशियां, यादें और पीढ़ियों से चला आ रहा अपनापन भी धीरे-धीरे दम तोड़ने लगता है।
रिश्तों को जीतने के लिए किसी को हराना जरूरी नहीं। कभी-कभी थोड़ा झुकना, थोड़ा समझना और थोड़ा अपनापन दिखाना ही पूरे परिवार को बिखरने से बचा लेता है।
लेखक । अज़हर उमरी
