निजामुद्दीन औलिया से अजमेर शरीफ, देवा शरीफ और किछौछा शरीफ तक साझा संस्कृति की अनूठी मिसाल; सूफी संतों की शिक्षाओं में छिपा है अमन, भाईचारे और इंसानियत का पैगाम
लेखक – अज़हर उमरी, वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक
हिन्दुस्तान केवल एक भौगोलिक सीमा का नाम नहीं है, बल्कि यह सदियों से विकसित हुई ऐसी सभ्यता है, जिसकी पहचान अनेक धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं के आपसी मेलजोल से बनी है। यहां मंदिरों की घंटियां, मस्जिदों की अजान, गुरुद्वारों की गुरबाणी और चर्च की प्रार्थनाएं मिलकर विविधता में एकता की खूबसूरत तस्वीर पेश करती हैं।
इसी साझा विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं हिन्दुस्तान की खानकाहें और दरगाहें। ये केवल सूफी संतों की आध्यात्मिक साधना के केंद्र नहीं हैं, बल्कि सदियों से प्रेम, सेवा, सहिष्णुता, इंसानियत और सामाजिक एकता का संदेश देती आई हैं।
दीवाली के अवसर पर देश की कुछ दरगाहों और सूफी स्थलों पर दीपक जलाने, रोशनी करने और जश्न-ए-चरागां की परंपराएं इस सांस्कृतिक मेलजोल की विशेष मिसाल प्रस्तुत करती हैं। जब किसी दरगाह के आंगन में मिट्टी के दीये रोशन होते हैं, तो उनका अर्थ केवल सजावट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वे विभिन्न समुदायों के बीच विश्वास, सम्मान और आत्मीयता का संदेश भी देते हैं।
सूफी संतों की शिक्षाएं: इंसानियत सबसे बड़ा धर्म
हिन्दुस्तान में सूफी परंपरा ने समाज को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी, हजरत निजामुद्दीन औलिया और हजरत बाबा फरीद जैसे महान सूफी संतों की शिक्षाओं में प्रेम, विनम्रता, सेवा और मानवता को विशेष महत्व दिया गया।
सूफी विचारधारा ने यह संदेश दिया कि इंसान की पहचान केवल उसके नाम, मजहब या सामाजिक हैसियत से नहीं, बल्कि उसके आचरण और दूसरों के प्रति उसके व्यवहार से होती है।
भूखे को खाना खिलाना, जरूरतमंद की मदद करना, दुखी के आंसू पोंछना और समाज में शांति स्थापित करना खानकाही परंपरा की प्रमुख विशेषताएं रही हैं।
यही कारण है कि देश की अनेक दरगाहों पर अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोग अपनी श्रद्धा, विश्वास और मोहब्बत के साथ पहुंचते हैं।
देश की छह प्रमुख दरगाहें और दीवाली की रोशनी
देश के विभिन्न हिस्सों में कुछ दरगाहों से जुड़ी दीपावली की परंपराओं और आयोजनों का उल्लेख समाचार रिपोर्टों, स्थानीय विवरणों तथा सांस्कृतिक लेखों में मिलता है। इन उदाहरणों को हिन्दुस्तान की साझी संस्कृति के संदर्भ में समझना महत्वपूर्ण है।
1. हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह, दिल्ली
राजधानी दिल्ली में स्थित हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह सूफी प्रेम और इंसानियत की ऐतिहासिक पहचान है। यहां दीपावली के अवसर पर मिट्टी के दीये जलाने और दरगाह को रोशन करने की परंपरा का उल्लेख समाचार रिपोर्टों में मिलता है।
वर्ष 2023 में यहां 721 दीपक जलाकर जश्न-ए-चरागां आयोजित किए जाने की खबर सामने आई थी। इस आयोजन में विभिन्न समुदायों के लोगों की भागीदारी ने आपसी सद्भाव का संदेश दिया।
हजरत निजामुद्दीन औलिया की शिक्षाओं में प्रेम, करुणा और मानव सेवा का विशेष स्थान रहा है।
2. ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह, अजमेर शरीफ
राजस्थान के अजमेर में स्थित हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह दुनिया भर में प्रसिद्ध है। ख्वाजा गरीब नवाज ने प्रेम, सेवा और मानवता का संदेश दिया, जिसके कारण उनकी दरगाह पर हर धर्म और समुदाय के लोग पहुंचते हैं।
दीपावली के अवसर पर यहां रोशनी और दीपक जलाने की परंपरा का उल्लेख कुछ सांस्कृतिक विवरणों में मिलता है। हालांकि, इसे दरगाह का नियमित या आधिकारिक वार्षिक आयोजन बताने के लिए अलग से प्रमाण आवश्यक है।
अजमेर शरीफ की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सर्वसमावेशी पहचान और विभिन्न समुदायों की आस्था है।
3. हाजी अली दरगाह, मुंबई
मुंबई के समुद्र तट के निकट स्थित हजरत सैयद हाजी अली शाह बुखारी की दरगाह देश के प्रसिद्ध सूफी स्थलों में शामिल है।
दीपावली के अवसर पर दरगाह परिसर में रोशनी और दीपक जलाने के उल्लेख कुछ मीडिया रिपोर्टों में मिलते हैं। इस दरगाह से विभिन्न धर्मों के लोगों का भावनात्मक जुड़ाव रहा है।
मुंबई जैसे महानगर में यह दरगाह धार्मिक आस्था के साथ-साथ साझा सामाजिक जीवन की भी पहचान है।
4. देवा शरीफ: जहां मनाया जाता है जश्न-ए-चरागां
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में स्थित हाजी वारिस अली शाह की दरगाह देवा शरीफ गंगा-जमुनी तहजीब की सबसे चर्चित मिसालों में से एक है।
हाजी वारिस अली शाह की शिक्षाओं से जुड़ा प्रसिद्ध संदेश ‘जो रब है वही राम है’ धार्मिक सद्भाव और इंसानी एकता की भावना को व्यक्त करता है।
दीपावली के अवसर पर देवा शरीफ में जश्न-ए-चरागां का विशेष उल्लेख मिलता है। यहां दीपक और रोशनी के माध्यम से खुशियां साझा करने की परंपरा को हिन्दू-मुस्लिम एकता की खूबसूरत मिसाल माना जाता है।
देवा शरीफ का यह संदेश बताता है कि मोहब्बत की कोई धार्मिक सीमा नहीं होती।
5. किछौछा शरीफ: नीर शरीफ के आसपास दीपों की परंपरा
उत्तर प्रदेश के अम्बेडकर नगर जिले में स्थित हजरत मखदूम अशरफ जहांगीर सिमनानी की दरगाह किछौछा शरीफ एक प्रसिद्ध सूफी तीर्थस्थल है।
इस दरगाह के निकट स्थित नीर शरीफ तालाब के आसपास दीपावली पर दीपक और मोमबत्तियां जलाने की परंपरा का उल्लेख सांस्कृतिक रिपोर्टों में मिलता है।
यहां विभिन्न समुदायों के लोगों की आवाजाही और आस्था इस स्थल को साझा सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण उदाहरण बनाती है।
6. हजरत क़मरुद्दीन शाह की दरगाह, झुंझुनूं
राजस्थान के झुंझुनूं में स्थित हजरत क़मरुद्दीन शाह की दरगाह भी दीपावली के अवसर पर रोशनी और दीपक जलाने की परंपरा के उल्लेख के कारण चर्चा में रही है।
यहां मिट्टी के दीये और मोमबत्तियां जलाने तथा मिठाइयां बांटने के विवरण सामने आए हैं। स्थानीय परंपराओं में हजरत क़मरुद्दीन शाह और संत चंचलनाथ के बीच मित्रता की कहानियां भी सुनाई जाती हैं।
यह परंपरा धार्मिक पहचान से ऊपर उठकर दोस्ती, सम्मान और सामाजिक सद्भाव का संदेश देती है।
दीवाली और सूफी परंपरा: प्रकाश के संदेश में समानता
दीवाली भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण पर्व है। यह प्रकाश, उल्लास, खुशियों और नई शुरुआत का प्रतीक है। भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन की परंपरागत मान्यता से जुड़ा यह त्योहार अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देता है।
सूफी परंपरा में भी दिलों को रोशन करने, अहंकार को मिटाने और इंसानियत को अपनाने पर जोर दिया गया है। इस दृष्टि से दीवाली के दीपक और खानकाहों की रूहानी शिक्षाओं में एक खूबसूरत मानवीय समानता दिखाई देती है।
यह दोनों धर्मों की मान्यताओं को एक जैसा बताने का प्रयास नहीं, बल्कि उन मानवीय मूल्यों को पहचानने की कोशिश है, जो अलग-अलग परंपराओं में प्रेम, करुणा और सद्भाव के रूप में मौजूद हैं।
देवा शरीफ से किछौछा तक: साझा विरासत की जीवंत मिसाल
उत्तर प्रदेश की धरती पर देवा शरीफ और किछौछा शरीफ जैसी दरगाहें इस बात की याद दिलाती हैं कि धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक मेलजोल एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
देवा शरीफ में हाजी वारिस अली शाह की सार्वभौमिक प्रेम की शिक्षा और किछौछा शरीफ में दीपावली पर नीर शरीफ के आसपास दीये जलाने की परंपरा इस विरासत के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। किछौछा की दीपावली परंपरा में गैर-मुस्लिम श्रद्धालुओं की भागीदारी और पहली लौ जलाने की स्थानीय रस्म विशेष महत्व रखती है। Karvaan India+2
इसी तरह झुंझुनूं की कमरुद्दीन शाह दरगाह में लगभग 250 वर्ष पुरानी बताई जाने वाली दीपावली परंपरा और चंचलनाथ टीले के संतों के साथ आपसी संबंध धार्मिक सद्भाव की एक प्रेरक कहानी प्रस्तुत करते हैं। NDTV RAJASTHAN+2
इन उदाहरणों को केवल त्योहार मनाने की घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे सामाजिक संबंधों के रूप में भी देखना चाहिए।
नई पीढ़ी को समझानी होगी हिन्दुस्तान की असली विरासत
आज की युवा पीढ़ी तकनीक और सोशल मीडिया के दौर में जी रही है। सूचनाओं की अधिकता के बीच अधूरी जानकारी, अफवाहें और नफरत फैलाने वाली बातें भी तेजी से समाज तक पहुंचती हैं।
ऐसे समय में विद्यालयों, मदरसों, धार्मिक संस्थाओं, खानकाहों और सामाजिक संगठनों की जिम्मेदारी है कि वे नई पीढ़ी को हिन्दुस्तान की साझी सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराएं।
बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि दूसरे धर्म के त्योहार का सम्मान करने का अर्थ अपनी धार्मिक आस्था से समझौता करना नहीं है। बल्कि यह एक सभ्य, जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक होने की पहचान है।
हमें ऐसी पीढ़ी तैयार करनी होगी जो अपने धर्म और संस्कृति से प्रेम करे, लेकिन दूसरे की आस्था का सम्मान करना भी जानती हो।
रोशनी केवल घरों में नहीं, दिलों में भी होनी चाहिए
हिन्दुस्तान की खानकाहों और दीवाली के बीच सबसे खूबसूरत रिश्ता उस मानवीय संदेश में दिखाई देता है, जो हमें नफरत के अंधेरे से निकलकर मोहब्बत और इंसानियत की रोशनी की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है।
आज देश को आर्थिक विकास के साथ-साथ मजबूत सामाजिक रिश्तों की भी आवश्यकता है। विकास तभी सार्थक होगा, जब समाज में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति खुद को सुरक्षित, सम्मानित और बराबरी का हकदार महसूस करे।
खानकाहों की चौखट से उठने वाला मोहब्बत का पैगाम और दीपावली के दीपकों से फैलने वाला प्रकाश हमें याद दिलाता है कि इंसानियत से बड़ा कोई रिश्ता नहीं और आपसी विश्वास से मजबूत कोई सामाजिक आधार नहीं।
आइए, इस दीवाली हम केवल अपने घरों को ही नहीं, बल्कि अपने दिलों को भी रोशन करें। नफरत की जगह मोहब्बत, भेदभाव की जगह समानता और दूरी की जगह संवाद को अपनाएं।
क्योंकि हिन्दुस्तान की असली खूबसूरती किसी एक धर्म, मजहब या समुदाय में नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों में है जो अलग-अलग आस्थाओं के बावजूद एक-दूसरे के साथ मिलकर इस मुल्क को अपना घर मानते हैं।
यही खानकाहों की रूहानी विरासत है, यही दीवाली का मानवीय संदेश और यही हिन्दुस्तान की गंगा-जमुनी तहजीब की असली पहचान है।
— अज़हर उमरी
वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक
TIMES OF TAJ डिस्क्लेमर: यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों एवं उपलब्ध सांस्कृतिक विवरणों पर आधारित है। इससे संस्थान की सहमति अनिवार्य रूप से प्रतिबिंबित नहीं होती।
