लेखक। अज़हर उमरी
इस्लामी इतिहास में 21 रमज़ान गहरे ग़म और इबरत का दिन है। इसी दिन इस्लाम के चौथे ख़लीफ़ा, शेर-ए-ख़ुदा और अद्ल-ओ-इंसाफ़ की मिसाल Ali ibn Abi Talib ने शहादत का दर्जा पाया। उनकी ज़िंदगी बहादुरी, इल्म, सादगी और इंसानियत की ऐसी मिसाल है जो आज भी दुनिया के लिए रहनुमाई का स्रोत है।
मस्जिद-ए-कूफ़ा में हमला
19 रमज़ान 40 हिजरी की सुबह जब हज़रत अली फ़ज्र की नमाज़ पढ़ाने के लिए Great Mosque of Kufa पहुँचे, तभी एक खारिजी व्यक्ति Abd al-Rahman ibn Muljam ने ज़हरीली तलवार से उन पर हमला कर दिया। इस हमले में वे बुरी तरह घायल हो गए। दो दिन तक ज़ख़्मों की तकलीफ़ सहने के बाद 21 रमज़ान को उन्होंने शहादत का मुकाम हासिल किया।
आख़िरी नसीहत
शहादत से पहले उन्होंने अपने बेटों Hasan ibn Ali और Husayn ibn Ali को नसीहत की:
अल्लाह से डरते रहना
ज़ुल्म के खिलाफ खड़े रहना
यतीमों और ग़रीबों का ख़ास ख्याल रखना
नमाज़ और इंसाफ़ को कभी न छोड़ना
यह नसीहत आज भी इंसानियत और न्याय का महान संदेश मानी जाती है।
ग़ुस्ल, कफ़न और नमाज़-ए-जनाज़ा
इतिहास के अनुसार, हज़रत अली की शहादत के बाद उनके बड़े बेटे Hasan ibn Ali और छोटे बेटे Husayn ibn Ali ने मिलकर उनका ग़ुस्ल दिया और कफ़न पहनाया।
इसके बाद नमाज़-ए-जनाज़ा भी उनके बेटे हज़रत इमाम हसन ने पढ़ाई। उस समय कूफ़ा के लोग अपने प्यारे इमाम की जुदाई में गहरे ग़म में डूबे हुए थे।
दफ़्न कहाँ किया गया
हज़रत अली को रात के समय ख़ामोशी के साथ दफ़्न किया गया। उनकी क़ब्र आज Imam Ali Shrine में मानी जाती है, जो इराक़ के शहर Najaf में स्थित है। आज यह स्थान दुनिया भर के मुसलमानों के लिए एक अहम ज़ियारतगाह है, जहाँ हर साल लाखों लोग हाज़िरी देते हैं।
इंसाफ़ और इल्म की अमर विरासत
हज़रत अली का पूरा जीवन इंसाफ़, सादगी और ज्ञान की रोशनी से भरा हुआ था। पैग़म्बर-ए-इस्लाम Muhammad का मशहूर कथन है:
“मैं इल्म का शहर हूँ और अली उसका दरवाज़ा हैं।”
आज के दौर के लिए सबक
हज़रत अली की शहादत हमें सिखाती है कि इंसाफ़, सच्चाई और इंसानियत के रास्ते पर चलने वाला इंसान कभी हारता नहीं। उनकी ज़िंदगी और शहादत यह पैग़ाम देती है कि असली ताक़त इंसाफ़ और नेक किरदार में होती है।
21 रमज़ान को दुनिया भर के मुसलमान मौला अली की शहादत को याद करते हुए उनके बताए हुए रास्ते—इंसाफ़, भाईचारा और इंसानियत—पर चलने का संकल्प लेते हैं।

