अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक शिक्षा केंद्र (सी.ई.सी.) और सर सय्यद अकादमी के सहयोग से राष्ट्रीय उर्दू भाषा प्रोत्साहन परिषद (एनसीपीयूएल) द्वारा विश्वविद्यालय के सी.ई.सी. के लॉन में संयुक्त रूप से 9-दिवसीय उर्दू पुस्तक मेले का आयोजन किया जा रहा है जिसका उद्घाटन आज कुलपति प्रो. नइमा खातून ने किया। इस अवसर पर एनसीपीयूएल के निदेशक डॉ. मोहम्मद शम्स इकबाल और अन्य विशिष्ट अतिथि उपस्थित थे। पचास से अधिक प्रकाशक इस मेले में भाग ले रहे हैं। मेले के दौरान प्रतिदिन सांस्कृतिक और अकादमिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे।
उद्घाटन भाषण में प्रो. नइमा खातून ने कहा कि एनसीपीयूएल के सहयोग से आयोजित यह उर्दू पुस्तक मेला केवल पुस्तकों का संग्रह नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और बौद्धिक उत्सव है। उन्हों ने कहा कि यह मेला एक बौद्धिक आंदोलन है, जो भाषा, साहित्य, शोध और सामाजिक चेतना को मजबूती देता है।उन्होंने बताया कि हाल ही में केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की बैठक में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने जोर देकर कहा कि उर्दू “हमारी अपनी भाषा” है और इसके विकास के लिए हर संभव प्रयास होने चाहिए। उन्होंने कुछ विश्वविद्यालयों, जिनमें एएमयू भी शामिल है, से विशेष रूप से आग्रह किया कि उर्दू में पाठ्यपुस्तकें और संदर्भ ग्रंथ प्रकाशित करें तथा उत्तम साहित्य प्रस्तुत कर भाषा को लोकप्रिय बनाएं।प्रो. खातून ने कहा कि एएमयू के शिक्षक उर्दू में उत्तम पुस्तकें लिखते हैं और विश्वविद्यालय उनके प्रकाशन को सुनिश्चित करेगा। उर्दू को उन्होंने एक सुंदर और परिष्कृत भाषा बताया, “जिसमें मोहब्बत के गीत भी हैं, प्रतिरोध की आवाज भी, और विचार की रोशनी भी।” उन्होंने कहा कि उर्दू ने हर दौर में अपनी गरिमा बनाए रखी और अनेक महान लेखकों, शायरों और चिंतकों की अभिव्यक्ति का माध्यम बनी।

उन्होंने कहा कि “यह पुस्तक मेला इस बात का ऐलान है कि हम किताबों की संस्कृति को जिंदा रखना चाहते हैं, पढ़ने की परंपरा को मजबूत करना चाहते हैं और अपनी भाषाओं के प्रोत्साहन के लिए प्रतिबद्ध हैं।” उन्होंने कहा कि डिजिटल दुनिया ने जानकारी के नए द्वार खोले हैं, परंतु किताबों का स्पर्श, खुशबू, गहराई और गंभीरता स्क्रीन पर नहीं मिल सकती।उन्होंने छात्रों से आग्रह किया कि वे मेले में आएँ, किताबें उठाएँ, उनके पन्ने पलटें, उनमें सवाल ढूँढें और उनके जवाब तलाशें। उन्होंने कहा कि पढ़ना केवल जानकारी लेना नहीं, बल्कि बौद्धिक प्रशिक्षण, चरित्र-निर्माण और रौशन खयाली की यात्रा है। प्रो. खातून ने एनसीपीयूएल के निदेशक डॉ. शम्स इकबाल का विशेष धन्यवाद किया और कहा कि संस्था ने हमेशा उर्दू भाषा और संस्कृति की सेवा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
अपने परिचयात्मक वक्तव्य में डॉ. शम्स इकबाल ने कहा कि यह मेला बौद्धिक विमर्श को बढ़ावा देने वाला मंच है। उन्होंने बताया कि हिंदी और अंग्रेजी के बाद उर्दू भारत में सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है, इसलिए इसके प्रोत्साहन के प्रयास सकारात्मक और भविष्यवादी दृष्टि से किए जाने चाहिए। उन्होंने सर सय्यद अहमद खाँ के उर्दू भाषा सुधार में किए गए योगदान का उल्लेख किया और कहा कि एएमयू का उर्दू संस्कृति से गहरा संबंध होने के कारण यह पुस्तक मेले के लिए सबसे उपयुक्त स्थान है। उन्हों ने मेले में गजलें, तरही मुशायरे, दास्तानगोई, लेखकों से मुलाकातें और बच्चों के लिए विशेष कार्यक्रम भी होंगे।
कथा साहित्य लेखक सैयद मोहम्मद अशरफ ने कहा कि सोशल मीडिया के क्षणिक प्रभाव के विपरीत किताबें स्थायी असर छोड़ती हैं और बेहतर समाज निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने युवाओं से कहा कि वे पढ़ने की आदत को मजबूत करें, क्योंकि किताबें कल्पनाशीलता और मानसिक क्षमता को निखारती हैं।
अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. हकीम सैयद जिल्लुर रहमान ने कहा कि अलीगढ़ हमेशा इस बात के लिए जाना गया है कि यहाँ विज्ञान, चिकित्सा, सर्जरी, इंजीनियरिंग और कानून के आधुनिक विषयों के शिक्षक भी उर्दू से गहरा लगाव रखते आए हैं। उन्होंने कहा कि “भाषा की भी अपनी प्रतिष्ठा होती है। उर्दू आसान भाषा है, इसे सीखना और पढ़ना चाहिए ताकि इसकी संस्कृति जिंदा रहे।”
सर सैयद अकादमी के निदेशक प्रो. शाफे किदवई ने कहा कि सर सैयद स्वयं बुक-रीडिंग सोसाइटी के संस्थापक थे और विपुल लेखन करते थे। यह पुस्तक मेला उनकी विद्वतापूर्ण परंपरा का विस्तार है। उन्होंने पढ़ने के फायदे बताते हुए कहा कि सोशल मीडिया या वर्चुअल पढ़ाई का प्रभाव क्षणिक होता है, जबकि किताबें मानसिक और कल्पनाशील क्षमता को अधिक गहराई से विकसित करती हैं।
कार्यक्रम का समापन सी.ई.सी. के समन्वयक प्रो. मोहम्मद नवेद खान के धन्यवाद प्रस्ताव के साथ हुआ। उद्घाटन सत्र में एनसीपीयूएल की कई नई पुस्तकों का विमोचन भी किया गया।कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शिक्षक और गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे, जिनमें डीन स्टूडेंट्स वेलफेयर प्रो. रफीउद्दीन भी शामिल थे।

