मुख्तसर सवानिह-ए-हयात
हज़रत सैय्यद मोहम्मद जमालुद्दीन, जिनका लक़ब “जानेमन जन्नती” तथा अवाम में “मीर जुम्मन जन्नती” के नाम से प्रसिद्ध है, सिलसिला-ए-मदारिया के मशहूर बुज़ुर्गों में शुमार किए जाते हैं। आप गिरोह-ए-दीवानगान-ए-मदार के बानी हैं।
रिवायतों के अनुसार, आप हज़रत सैय्यद मोहिउद्दीन अब्दुल क़ादिर जीलानी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के सगे भांजे थे। आपके वालिद का नाम हज़रत सैय्यद महेमूद और वालिदा का नाम हज़रत बीबी नसीबा रहमतुल्लाह अलैहा था। आपके छोटे भाई हज़रत सैय्यद अहमद बादया पा क़ुद्दिस सिर्रहुल अज़ीज़ थे।
कहा जाता है कि आपकी पैदाइश हज़रत सैय्यद बदीउद्दीन अहमद ज़िंदा शाह मदार क़ुत्बुल मदार रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की दुआ से हुई। आपका मूल नाम सैय्यद मोहम्मद था।
“जानेमन जन्नती” लक़ब मिलने का वाक़िया
रिवायत है कि एक बार बचपन में आप छत से गिर गए और आपका इंतिक़ाल हो गया। आपकी वालिदा ने यह ख़बर हज़रत ज़िंदा शाह मदार रहमतुल्लाह अलैह को दी। आपने बारगाह-ए-इलाही में दुआ की, जो क़ुबूल हुई और आप दोबारा ज़िंदा हो गए। उस समय हज़रत शाह मदार ने फ़रमाया:
“जानेमन जन्नती अस्त” (यह जन्नत का प्यारा है)
तभी से आप “जानेमन जन्नती” के नाम से मशहूर हो गए।
दीवानगान-ए-मदार की बुनियाद
आपके माध्यम से सिलसिला-ए-दीवानगान-ए-मदार जारी हुआ। आपके असंख्य ख़ुलफ़ा और मुरीद हुए। आपकी अनेक करामात मशहूर हैं। रिवायतों में यह भी मिलता है कि मशहूर सूफ़ी शायर शेख़ सादी ने एक बुज़ुर्ग का ज़िक्र किया है जो शेर पर सवार और साँप को कोड़े की तरह हाथ में लिए हुए थे। बाद में ज्ञात हुआ कि वे हज़रत जमालुद्दीन जानेमन जन्नती थे।
यह भी वर्णित है कि आपकी मुलाक़ात हज़रत मख़दूम जहानियाँ जहांगश्त रहमतुल्लाह अलैह से हुई थी।
मदारिया सिलसिले की शाखाएँ
हज़रत क़ुत्बुल मदार रहमतुल्लाह अलैह से अनेक गिरोह जारी हुए, जिनमें प्रमुख हैं—
- गिरोह ख़ादिमान-ए-मदारिया
- गिरोह दीवानगान-ए-मदारिया
- गिरोह आशिकान-ए-मदारिया
- गिरोह तालिबान-ए-मदारिया
इनका उल्लेख विभिन्न मदारिया ग्रंथों में मिलता है।
ज़िंदगी और तबलीग़-ए-दीन
रिवायतों के अनुसार, आपने अपने पीर-ओ-मुर्शिद की तरह विवाह नहीं किया और आपकी उम्र लगभग 400 वर्ष बताई जाती है।
आपने तबलीग़-ए-दीन के लिए भारत के अनेक क्षेत्रों का सफ़र किया। आपके चिल्ला शरीफ़ महाराष्ट्र (चंद्रपुर), कर्नाटक (कोहिनूर पहाड़), उत्तर प्रदेश, राजस्थान (अजमेर) और गुजरात सहित कई स्थानों पर आज भी मौजूद बताए जाते हैं।
गेसू (बाल) न कटवाने की रिवायत
कहा जाता है कि एक बार हज़रत क़ुत्बुल मदार ने अपना दस्त-ए-अक़दस आपके सर पर रखा। इसके बाद आपने ताउम्र अपने बाल नहीं कटवाए, ताकि मुहब्बत और अदब के तौर पर बाल ज़मीन पर गिरकर उनकी बेअदबी न हो। इसी रिवायत की पैरवी करते हुए अनेक मलंग हज़रात भी अपने लंबे गेसू रखते हैं।
प्रमुख मलंग बुज़ुर्ग
गिरोह-ए-दीवानगान-ए-मदारिया से जुड़े अनेक प्रसिद्ध बुज़ुर्ग हुए, जिनमें हज़रत सैय्यद सध्दन शाह सरमस्त गुजराती, हज़रत बाबा मान दरियाई (बड़ौदा), हज़रत सादिक़ शाह सरमस्त (नासिक), हज़रत कुतुब गौरी (कोलार, कर्नाटक), हज़रत हाजी अब्दुर्रहमान उर्फ़ हाजी मलंग बाबा (कल्याण), हज़रत मासूम अली शाह (कामठी, नागपुर), हज़रत मूसा शाह सुहागी (नेतीवली, कल्याण), हज़रत पीर जमाल शाह तजर्री (पनवेल), हज़रत ख़्वाजा चमेली शाह सरमस्त (उज्जैन), हज़रत ख़्वाजा बाबू शाह लतीफ़ दीवान (रतलाम) तथा हज़रत इलाहदाद आतीशी (उत्तर प्रदेश) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
आज भी अनेक मलंग सात से नौ गज तक लंबे गेसू रखते हैं और इबादत व रियाज़त में अपना जीवन व्यतीत करते हैं। इनकी बड़ी संख्या हर वर्ष दरबार-ए-आलिया मकनपुर शरीफ़ (उत्तर प्रदेश) में हज़रत ज़िंदा शाह मदार रहमतुल्लाह अलैह के उर्स-ए-मुबारक के अवसर पर देखी जा सकती है।
उर्स-ए-शरीफ़
हज़रत सैय्यद मोहम्मद जमालुद्दीन जानेमन जन्नती क़ुद्दिस सिर्रहुल अज़ीज़ का उर्स-ए-शरीफ़ प्रत्येक वर्ष 15–16 मुहर्रम को अकीदत और एहतराम के साथ मनाया जाता है।
स्रोत: मदार-ए-आज़म (मक्का–मदीना–मकनपुर), सवानेह-ए-हयात हज़रत सैय्यद बदीउद्दीन ज़िंदा शाह मदार क़ुत्बुल मदार, पृष्ठ 115–117।
✍️ दुआगो:
झहीरुद्दीन – आशिकान-ए-मदार
मो.: 9552438376 / 9284497729

