आगरा। रामकथा के प्रति श्रद्धा और साहित्यिक अभिव्यक्ति का अनूठा उदाहरण आगरा में सामने आया है। श्री मोरारी बापू की रामकथा सुनने पहुंचीं आगरा की मनोविज्ञान शोधार्थी राहत जहां खानम ने कथा के दौरान अपने भीतर उमड़ने वाले आध्यात्मिक और मानवीय भावों को उर्दू भाषा में शब्द देना शुरू किया। उनकी लिखी भावपूर्ण अनुभूतियों ने व्यासपीठ का भी ध्यान आकर्षित किया और कथा के दौरान उनकी रचनाओं का उल्लेख किया गया।

राहत जहां खानम मनोविज्ञान की शोधार्थी होने के साथ-साथ रिक्रूटमेंट एवं प्लेसमेंट के क्षेत्र से भी जुड़ी हैं। वह अपनी कंपनी के माध्यम से युवाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने का कार्य करती हैं। उनका कहना है कि रामकथा सुनते हुए उन्हें जो आध्यात्मिक, मानवीय और आत्मिक अनुभूतियां होती हैं, उन्हें वह अपनी मातृभाषा उर्दू में लिखकर संजो रही हैं।
बताया गया कि राहत जहां खानम द्वारा कथा के चार दिनों की लिखी गई भावपूर्ण रचनाओं का कथा के दौरान व्यासपीठ से उल्लेख एवं पाठ किया गया। इसे उपस्थित श्रद्धालुओं ने भी रुचि और भावनात्मक जुड़ाव के साथ सुना।
राहत की उर्दू अभिव्यक्तियों में रामकथा के प्रसंगों को प्रेम, करुणा, मानवता और आत्मचिंतन के दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है। उनका मानना है कि रामकथा को केवल किसी एक समुदाय या धर्म तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसमें प्रेम, करुणा, मानवता और आत्मबोध जैसे सार्वभौमिक संदेश निहित हैं।
उन्होंने कहा कि कथा के प्रत्येक दिन की अनुभूति को वह अपनी भाषा में लिख रही हैं, ताकि उस समय महसूस किए गए भाव और विचार सुरक्षित रह सकें। उनके अनुसार भाषा अलग हो सकती है, लेकिन प्रेम, करुणा और मानवता की भावनाएं सभी को जोड़ती हैं।
उर्दू भाषा में रामकथा की अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने की इस पहल को सामाजिक एवं सांस्कृतिक संवाद की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कथा के दौरान उनकी रचनाओं का उल्लेख होने के बाद यह प्रयास श्रद्धालुओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
राहत जहां खानम का उद्देश्य कथा के शेष दिनों की अनुभूतियों को भी इसी तरह शब्दबद्ध कर उन्हें एक साहित्यिक संकलन का रूप देना है, ताकि रामकथा से जुड़े प्रेम, करुणा और मानवीय मूल्यों के संदेश को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाया जा सके।
