एक कड़वी मगर सोचने पर मजबूर करने वाली सच्चाई
लेखक: अज़हर उमरी
आज के मुसलमानों की सामाजिक और शैक्षिक स्थिति पर नज़र डालें तो एक सवाल बार-बार ज़ेहन में उठता है कि आखिर हम किस दिशा में जा रहे हैं? जिस कौम की पहली शिक्षा ही “इक़रा” यानी पढ़ो से शुरू होती है, उसी कौम में आज किताब लिखने वाले की क़द्र कम और तावीज़ लिखने वाले की कमाई ज़्यादा दिखाई देती है। यह सिर्फ़ एक जुमला नहीं, बल्कि हमारे समाज के सामने खड़ा एक गंभीर सवाल है।
आख़िर ऐसा क्यों है कि इल्म बाँटने वाला संघर्ष करता है और अंधविश्वास के सहारे लोगों की उम्मीदों का कारोबार करने वाला आसानी से अपनी दुकान चला लेता है?
इस्लाम ने इल्म को हमेशा अहमियत दी है। क़ुरआन इंसान को सोचने, समझने, ग़ौर करने और सच्चाई तलाश करने की दावत देता है। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद ﷺ की तालीमात में भी इल्म हासिल करने की बड़ी फ़ज़ीलत बयान की गई है। इसके बावजूद अगर हमारे समाज में शिक्षा, शोध, किताबों और तर्कपूर्ण विचारों की जगह अंधविश्वास, बिना प्रमाण के दावों और चमत्कारों की उम्मीदें बढ़ने लगें, तो हमें ठहरकर आत्ममंथन करना चाहिए।
इल्म से दूरी, अंधविश्वास से नज़दीकी
किसी भी समाज की तरक़्क़ी उसकी सोच, शिक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर निर्भर करती है। किताब इंसान को सवाल करना सिखाती है, सही और ग़लत में फ़र्क़ समझाती है और उसे अपने पैरों पर खड़ा होने का हौसला देती है। इसके विपरीत, जब किसी व्यक्ति की परेशानी का फ़ायदा उठाकर उसे हर समस्या का समाधान किसी तावीज़, गंडे या कथित चमत्कार में दिखाया जाता है, तो वह इंसान वास्तविक कारणों और व्यावहारिक समाधानों से दूर हो सकता है।
यहाँ यह समझना भी ज़रूरी है कि हर तावीज़ लिखने वाला धोखेबाज़ नहीं होता और न ही हर धार्मिक अमल को अंधविश्वास कहा जा सकता है। असली समस्या तब पैदा होती है, जब धर्म के नाम पर डर पैदा किया जाए, बीमारी के इलाज के बदले चमत्कार का भरोसा दिया जाए या मजबूर इंसान की जेब से पैसा निकालने के लिए उसकी आस्था का इस्तेमाल किया जाए।
हमारी प्राथमिकताएँ क्या हैं?
अगर कोई नौजवान किताब लिखता है, शोध करता है, समाज की समस्याओं पर लेख लिखता है या शिक्षा के माध्यम से बदलाव लाने की कोशिश करता है, तो क्या हम उसे उतनी ही अहमियत देते हैं, जितनी किसी ऐसे व्यक्ति को देते हैं जो हमारी हर परेशानी का तुरंत समाधान देने का दावा करता है?
अगर जवाब ‘नहीं’ है, तो समस्या सिर्फ़ कमाई की नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक प्राथमिकताओं की भी है।
हमें ऐसे शिक्षकों, लेखकों, वैज्ञानिकों, डॉक्टरों, शोधकर्ताओं और विचारकों को प्रोत्साहित करना होगा, जो समाज को ज्ञान, हुनर और आत्मनिर्भरता की ओर ले जाते हैं। बच्चों को सवाल पूछने की आज़ादी देनी होगी। घरों में किताबों को जगह देनी होगी। मस्जिदों, मदरसों, स्कूलों और सामाजिक संस्थाओं में शिक्षा तथा विवेकपूर्ण सोच को बढ़ावा देना होगा।
बदलाव की शुरुआत हमसे होगी
किसी कौम की कमजोरी का मज़ाक उड़ाना आसान है, लेकिन उसकी कमज़ोरी को दूर करने के लिए मेहनत करना मुश्किल। इसलिए ज़रूरत सिर्फ़ आलोचना की नहीं, बल्कि सुधार की है।
हमें अपनी नई पीढ़ी को यह समझाना होगा कि दुआ और मेहनत एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। आस्था अपनी जगह है और इलाज, शिक्षा, शोध तथा तर्क अपनी जगह। बीमारी हो तो योग्य डॉक्टर से सलाह लें, शिक्षा की कमी हो तो किताब और शिक्षक का सहारा लें, रोज़गार की समस्या हो तो हुनर सीखें और सामाजिक परेशानी हो तो उसके वास्तविक कारणों को समझें।
याद रखिए, कोई भी समाज केवल अपनी पुरानी महानता के किस्से सुनाकर महान नहीं बनता। उसे अपने वर्तमान को बेहतर और भविष्य को मज़बूत बनाना पड़ता है।
आख़िरी सवाल
आज हमें तय करना है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को सवालों से डरने वाली बनाना चाहते हैं या सवालों के जवाब तलाशने वाली? हम उसे केवल समस्याओं के चमत्कारी समाधान खोजने की आदत देना चाहते हैं या समस्याओं को समझकर उनका हल निकालने का हुनर भी सिखाना चाहते हैं?
क्योंकि जिस समाज में किताब की क़ीमत कम हो जाती है, वहाँ ज्ञान कमज़ोर पड़ने लगता है। और जहाँ ज्ञान कमज़ोर पड़ता है, वहाँ अंधविश्वास को अपनी जगह बनाने का अवसर मिल जाता है।
कौम की असली तरक़्क़ी तावीज़ों की गिनती से नहीं, किताबों की क़द्र, शिक्षा के प्रसार, इंसाफ़ की समझ और इंसान की सोच से मापी जानी चाहिए।
आइए, किसी पर उँगली उठाने से पहले अपने घर में एक किताब बढ़ाएँ, अपने बच्चे को एक सवाल पूछने दें और अपने समाज में ज्ञान की क़द्र करने की शुरुआत करें।
क्योंकि बदलाव का पहला क़दम दूसरों को बदलना नहीं, बल्कि अपनी सोच को बेहतर बनाना है।
— अज़हर उमरी
