आगरा: मस्जिद नहर वाली के ख़तीब मोहम्मद इक़बाल ने आज जुमे के ख़ुतबे में सीनियर सिटीज़न लोगों के बारे में बात करते हुए कहा कि बुढ़ापा माफ़ी का आख़िरी मौका है, अपने परवरदिगार को राज़ी कर लें। ख़तीब ने क़ुरआन करीम की आयत की तिलावत की [अल-अहक़ाफ़: 15] अनुवाद: जब इंसान अपनी जवानी को पहुँचता है और चालीस साल का होता है तो कहता है ऐ मेरे रब मुझे तौफ़ीक़ दे कि मैं तेरी नेमत का शुक्र करूँ। हमें याद रखना चाहिए कि बुढ़ापा अल्लाह की क़ुदरत की एक निशानी है, इंसान जब जवानी की उम्र में होता है उसके तमाम अंग पूरी तरह काम कर रहे होते हैं उस वक़्त वह यह समझता है कि इन ताक़तों का मालिक मैं ख़ुद हूँ, बुढ़ापे की उम्र उसकी यह ख़ुशफ़हमी दूर कर देती है। अल्लाह के नबी ﷺ ने फ़रमाया [सहीह बुख़ारी: 6419] यानी जिसको अल्लाह ने साठ साल की उम्र दी अब उसके पास कोई बहाना बाक़ी नहीं रहा। यानी क्या हमने तुम्हें इतनी उम्र नहीं दी थी कि जो शख़्स उसमें नसीहत हासिल करना चाहता हासिल कर लेता, और तुम्हारे पास डराने वाला आया फिर भी तुमने होश से काम नहीं लिया, इसमें जवानों के लिए बड़ा सबक़ है। बूढ़ों को देख कर जवान इबरत हासिल करें, आज तुम ताक़तवर हो कल तुम भी इसी कुर्सी पर होगे, लंबी उम्र हुज्जत तमाम होने के लिए मिली है इसको ग़नीमत जानो और ज़्यादा से ज़्यादा नेक आमाल करने में वक़्त लगाओ क्योंकि हर शख़्स को उसके आख़िरी अमल पर परखा जाएगा। बुढ़ापे में कसरत से दुआएँ करो, सच्ची तौबा करो, बुढ़ापे की तौबा जल्दी क़बूल होती है। याद रखो बुढ़ापे में तुम्हें एहसास होगा कि तुमने औलाद की क्या तरबियत की तुम ख़ुद देख लोगे। ऐ अल्लाह मेरी उम्र का बेहतरीन हिस्सा उसका आख़िरी हिस्सा बना दे और मेरा बेहतरीन दिन वह बना जिस दिन मेरी मुलाक़ात तुझसे हो। आमीन या रब्बल आलमीन।
