लेखक। अज़हर उमरी
(वरिष्ठ पत्रकार)
इस्लामी तारीख़ में कुछ दिन ऐसे हैं जो सिर्फ़ तारीख़ नहीं होते, बल्कि इंसानियत के लिए पैग़ाम बन जाते हैं। एक शाबान ऐसा ही मुबारक दिन है, जब नबी-ए-करीम ﷺ की नवासी, हज़रत अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) और ख़ातून-ए-जन्नत हज़रत फ़ातिमा (रज़ियल्लाहु अन्हा) की बेटी, हज़रत ए ज़ैनब (रज़ियल्लाहु अन्हा) की पैदाइश हुई। यह दिन सब्र, इस्तिक़ामत और हक़ की गवाही का प्रतीक है।
नबवी घराने की रौशन कड़ी
हज़रत ए ज़ैनब (र.अ.) की परवरिश उस घर में हुई, जहाँ वह्य की खुशबू थी, अख़लाक़ की बुलंदी थी और इंसाफ़ की तालीम थी। नबी-ए-करीम ﷺ ने ख़ुद उनका नाम “ज़ैनब” रखा, जिसका अर्थ है बाप की ज़ीनत। बचपन ही से उनके किरदार में इल्म, हया, सब्र और बहादुरी के आसार नुमाया थे।
इल्म और तक़वा की मिसाल
हज़रत ए ज़ैनब (र.अ.) सिर्फ़ रसूल ﷺ की नवासी ही नहीं थीं, बल्कि इल्म और फ़हम-ओ-फ़िरासत में भी बेमिसाल थीं। उन्होंने कुरआन, सुन्नत और इस्लामी उसूलों को गहराई से समझा और अमल में ढाला। मदीना और बाद में कूफ़ा में, औरतें उनसे दीन की बातें सीखने आती थीं। उन्हें आलिमा, आबिदा और ज़ाहिदा कहा जाता है।
कर्बला के बाद हक़ की आवाज़
अगर एक शाबान उनकी पैदाइश का दिन है, तो कर्बला के बाद का हर दिन उनके पैग़ाम की तफ़्सीर है। शहीद-ए-कर्बला हज़रत इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) की शहादत के बाद, जब ज़ुल्म की ताक़तें जीत का जश्न मना रही थीं, उस वक़्त हज़रत ए ज़ैनब (र.अ.) ने कूफ़ा और दरबार-ए-यज़ीद में जो ख़ुत्बे दिए, उन्होंने ज़ुल्म की बुनियादें हिला दीं।
उन्होंने डंके की चोट पर कहा कि
“तुम समझते हो कि तुम जीत गए, लेकिन वक़्त गवाही देगा कि फ़तह हक़ की ही होगी।”
यह जुमला सिर्फ़ उस दौर के लिए नहीं, बल्कि हर ज़माने के मज़लूमों के लिए हौसले का पैग़ाम है।
सब्र जो शिकस्त नहीं बना
हज़रत ए ज़ैनब (र.अ.) ने भाई, बेटे, भतीजे और अपने अज़ीज़ों की क़ुर्बानी देखी, मगर न सब्र टूटा, न यक़ीन डगमगाया। उनका सब्र बेबसी नहीं, बल्कि अक़ीदे की ताक़त था। उन्होंने साबित किया कि औरत सिर्फ़ घर की ज़िम्मेदार नहीं, बल्कि ज़ुल्म के ख़िलाफ़ हक़ की सबसे मज़बूत आवाज़ भी हो सकती है।
आज के दौर के लिए पैग़ाम
एक शाबान हमें याद दिलाता है कि:
हिम्मत हालात की मोहताज नहीं होती
सब्र कमज़ोरी नहीं, सबसे बड़ी ताक़त है
औरत का किरदार समाज की तक़दीर बदल सकता है
हक़ के लिए बोलना ही असली ज़िन्दगी है
हज़रत ए ज़ैनब (रज़ियल्लाहु अन्हा) की पैदाइश का दिन सिर्फ़ जश्न का नहीं, बल्कि एहद का दिन है—
कि हम ज़ुल्म के सामने ख़ामोश नहीं रहेंगे,
हक़ का साथ देंगे,
और सब्र व इस्तिक़ामत को अपनी ज़िन्दगी का उसूल बनाएँगे।
एक शाबान मुबारक हो — सब्र की बेटी, हिम्मत की पहचान, और पैग़ाम-ए-कर्बला की ज़िन्दा आवाज़ के नाम।

