लेखक: न्याय योद्धा अयाज़ खान अच्छू
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी एक बार फिर अपने पुराने जनाधार की ओर लौटने की कोशिश कर रही है। इस बार पार्टी खेतों की मेड़ों, पंचायतों की चौपालों और जातीय समीकरणों के बीच अपनी जमीन तलाश रही है। राहुल गांधी की स्वीकार्यता, किसान आंदोलनों से निकली सहानुभूति और पार्टी की नई संगठनात्मक संरचना को मिलाकर कांग्रेस ने 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए व्यापक रणनीति तैयार की है।
6 अक्टूबर को लखनऊ के मालएवेन्यू स्थित प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित “किसान न्याय योद्धा सम्मेलन” में पार्टी के नए मिशन की झलक नजर आई। इस कार्यक्रम में प्रदेश के नवनियुक्त पदाधिकारियों, किसान न्याय योद्धाओं और डिजिटल किसान योद्धाओं का परिचय कराया गया। मंच पर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव और उत्तर प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और अखिल भारतीय किसान कांग्रेस के उपाध्यक्ष अखिलेश शुक्ला मौजूद थे।
सम्मेलन में किसानों की दस प्रमुख मांगों पर चर्चा हुई। इन मांगों में MSP की कानूनी गारंटी, गन्ने की कीमत में वृद्धि, महंगी बिजली दरों और स्मार्ट मीटर की वापसी, सरकारी बीमा कंपनी के माध्यम से फसल बीमा, नहरों की सफाई और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता, किसानों के कर्ज की माफी, साहूकारों के शोषण पर रोक, दुग्ध उत्पादकों को उचित दर, ग्रामीण युवाओं को रोजगार, खाद्य प्रसंस्करण और कोल्ड स्टोरेज योजनाओं से जोड़ना, और भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के तहत किसानों को मुआवजा देना शामिल थे।
अविनाश पांडे ने कहा कि कांग्रेस को किसानों से वही जुड़ाव फिर से कायम करना है जो पहले था। सम्मेलन में “डिजिटल किसान न्याय योद्धा” अभियान की शुरुआत भी की गई, जिसका उद्देश्य है कि पार्टी की नीतियां गांव-गांव तक पहुंचे और किसानों की समस्याएं सीधे पार्टी तक आएं। अखिलेश शुक्ला ने कहा कि किसान न्याय योद्धा और डिजिटल योद्धा राहुल गांधी के संदेश घर-घर पहुंचाएंगे और आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सरकार बनाने में योगदान देंगे।
इस मौके पर “वोट चोर गद्दी छोड़ो” नामक हस्ताक्षर अभियान भी शुरू किया गया, जिसमें हजारों किसानों ने बीजेपी और चुनाव आयोग की मिलीभगत के विरोध में हस्ताक्षर किए। यह कांग्रेस का संगठनात्मक नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश था कि पार्टी अब प्रतिरोध के रास्ते पर लौट रही है।
कांग्रेस ने राज्य में जातियों और समुदायों से सीधे संवाद भी शुरू कर दिया है। 1990 के दशक में मंडल और कमंडल की राजनीति ने यूपी में कांग्रेस का सामाजिक आधार खत्म कर दिया था। अब पार्टी उसी खोए हुए आधार को वापस पाने की रणनीति पर काम कर रही है। अक्टूबर और नवंबर में जाट, गुर्जर, पासी, निषाद, लोधी और अन्य समुदायों के प्रभावशाली नेताओं, विचारकों और सामाजिक प्रतिनिधियों के साथ विषय-आधारित बैठकों की श्रृंखला आयोजित की जाएगी।
पहला बड़ा सम्मेलन 14 अक्टूबर को मुजफ्फरनगर में होगा, जहां जाट किसान राजनीति का केंद्र माने जाते हैं। कांग्रेस इसे अपने किसान पुनर्जीवन अभियान का शुरुआती बिंदु बनाना चाहती है। अविनाश पांडे ने कहा कि कांग्रेस की असली ताकत उसका संगठन है। इसी सोच के साथ पार्टी ने दिसंबर तक 19.78 लाख पदाधिकारियों की नियुक्ति का लक्ष्य तय किया है। यह संगठन राज्य, जिला, ब्लॉक, मंडल और बूथ स्तरों पर काम करेगा। अब तक आठ हजार मंडलों में नियुक्ति प्रक्रिया चल रही है और लगभग डेढ़ लाख बूथों पर पदाधिकारी बनाए जा चुके हैं।
संगठन को मजबूत करने के लिए कांग्रेस वार्ड पार्षद, ग्राम पंचायत और क्षेत्र पंचायत स्तर पर अपने उम्मीदवार उतारेगी, जो जमीनी कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने में सहयोगी होंगे। इस प्रक्रिया के माध्यम से पंचायत, मंडल और ब्लॉक स्तर के कार्यकर्ताओं को भी सक्रिय किया जाएगा, जिससे संगठन की नींव मजबूत होगी।
इसके साथ ही कांग्रेस ने विधान परिषद (MLC) और स्थानीय निकाय चुनावों को भी अपनी रणनीति में शामिल किया है। पार्टी ने पांच स्नातक और छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की 11 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा की है। इसके लिए एक “कनेक्ट सेंटर” बनाया गया है, जो पूरे प्रदेश में वोटर फॉर्म भरवाने और उम्मीदवारों के लिए संपर्क बढ़ाने का काम करेगा।
यूपी कांग्रेस मीडिया विभाग के उपाध्यक्ष मनीष हिंदवी को इस सेंटर का मुख्य समन्वयक बनाया गया है। शिक्षक प्रकोष्ठ ने शिक्षकों के मुद्दों पर आंदोलन की रूपरेखा भी तैयार की है, जिसमें दिसंबर में विधान भवन घेराव की योजना शामिल है। कांग्रेस मानती है कि MLC चुनावों के माध्यम से वह शिक्षक और स्नातक वर्ग के बीच अपनी खोई पकड़ फिर से हासिल कर सकती है।
कांग्रेस ने अगले वर्ष होने वाले पंचायत चुनावों को 2027 की तैयारियों का “सेमीफाइनल” घोषित किया है। पार्टी 75 जिला पंचायतों, 826 ब्लॉकों और लगभग 58 हजार पंचायतों में लगभग 3,500 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि अब ऊपर से नाम तय नहीं होंगे, बल्कि स्थानीय चुनावों के जरिए जमीन से निकले लोगों को संगठन में लाया जाएगा।
पार्टी का यह पुनर्गठन केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि सोच में बदलाव भी है। अब यह देखा जा रहा है कि कौन पार्टी में आया है, न कि कौन छोड़ गया। वाराणसी और प्रयागराज में नए कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी दी गई है। महिलाओं और युवाओं को संगठन की मुख्यधारा में लाया जा रहा है।
अविनाश पांडे कहते हैं, “राहुल गांधी किसानों और युवाओं के लिए उम्मीद का चेहरा हैं। उनकी स्वीकृति हमें संगठन को फिर से जीवित करने का आत्मविश्वास देती है।” कांग्रेस मानती है कि अगर वह अपने बूथ स्तर तक के संगठन को स्थायी बना पाई, तो राहुल की राष्ट्रीय छवि उसे चुनावी ताकत में बदल सकती है।
उत्तर प्रदेश में सत्ता की राह खेतों और गांवों से होकर जाती है। इस बार कांग्रेस किसी तात्कालिक लहर पर नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संगठनात्मक ढांचे पर दांव लगा रही है। सत्ता में लौटे या न लौटे, यह तय है कि पार्टी ने खुद को फिर से प्रासंगिक बनाने का ठोस प्रयास शुरू कर दिया है।

