असम की सियासत में कभी मजबूत पकड़ रखने वाली Indian National Congress आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। सत्ता में वापसी का सपना अब केवल चुनावी नारों तक सीमित होता दिख रहा है, जबकि जमीनी हकीकत इससे कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है। पार्टी के सामने सबसे बड़ी समस्या बाहरी विरोध नहीं, बल्कि आंतरिक कमजोरियां बन चुकी हैं।
हाल ही में सांसद Pradyut Bordoloi का इस्तीफा इस बात का स्पष्ट संकेत है कि कांग्रेस के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। यह सिर्फ एक नेता का जाना नहीं, बल्कि उस गहरे असंतोष का परिणाम है, जो लंबे समय से संगठन के भीतर पल रहा था। गुटबाज़ी, आपसी मतभेद और नेतृत्व को लेकर असहमति ने पार्टी को अंदर से खोखला कर दिया है।
असम में कांग्रेस की स्थिति को कमजोर करने में नेतृत्व संकट की भी बड़ी भूमिका रही है। राज्य स्तर पर कोई ऐसा चेहरा उभरकर सामने नहीं आ पाया है, जो सभी गुटों को साथ लेकर चल सके। यही कारण है कि पार्टी एकजुट होकर मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाने में भी असफल रही है।
दूसरी ओर, Bharatiya Janata Party ने संगठनात्मक मजबूती, स्पष्ट रणनीति और मजबूत नेतृत्व के दम पर असम में अपनी पकड़ लगातार मजबूत की है। कांग्रेस जहां आंतरिक संघर्ष में उलझी हुई है, वहीं भाजपा जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ और प्रभाव को बढ़ाने में जुटी हुई है।
कांग्रेस के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वह समय रहते अपने संगठन को मजबूत कर पाएगी? क्या गुटबाज़ी को खत्म कर एकजुट होकर चुनावी मैदान में उतर सकेगी? अगर पार्टी इन बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं करती, तो असम में सत्ता में वापसी का सपना अधूरा ही रह जाएगा।
अंततः, असम में कांग्रेस की लड़ाई केवल भाजपा से नहीं, बल्कि खुद अपने अस्तित्व को बचाने की भी है। अगर पार्टी ने आत्ममंथन कर ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाले समय में उसकी स्थिति और भी कमजोर हो सकती है।

