पटना, बिहार विधानसभा चुनावों के लिए एनडीए सहयोगियों के बीच सीट बंटवारे की बातचीत से पहले,
हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) के प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने सोशल मीडिया पर
एक रहस्यमयी कविता-पोस्ट डालकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा छेड़ दी है।
मांझी ने रामधारी सिंह दिनकर की कालजयी रचना “रश्मिरथी” का एक अंश साझा करते हुए लिखा —
“हो न्याय अगर तो आधा दो,
यदि उसमें भी कोई बाधा हो,
तो दे दो केवल 15 ग्राम,
रखो अपनी धरती तमाम,
HAM वही ख़ुशी से खाएंगे,
परिजन पे असी ना उठाएँगे।”
इस पोस्ट में मांझी ने संकेतों में कहा है कि अगर गठबंधन में न्याय हो तो उनकी पार्टी को उसका हक़ दिया जाए,
अन्यथा वे ‘15 ग्राम’ यानी 15 सीटों से भी संतुष्ट रहेंगे —
जो कि एनडीए के अंदर सीट बंटवारे में उनकी हिस्सेदारी की मांग की ओर इशारा करता है।
‘रश्मिरथी’ से राजनीति तक
दिनकर की पंक्तियों में जहाँ पांडवों ने कौरवों से “पाँच गाँव” मांगे थे,
वहीं मांझी ने इस रूपक को बदलते हुए “15 ग्राम” की मांग की,
जिसे राजनीतिक पर्यवेक्षक “सीट शेयरिंग की काव्यात्मक मांग” के रूप में देख रहे हैं।
उनकी इस पोस्ट ने एनडीए के अंदर चल रही संवेदनशील बातचीत को एक नया प्रतीकात्मक मोड़ दे दिया है।
चिराग पासवान का भी संकेतभरा संदेश
सीट बंटवारे को लेकर बढ़ती चर्चाओं के बीच,
लोजपा (रामविलास) प्रमुख चिराग पासवान ने भी
अपने पिता रामविलास पासवान की पुण्यतिथि पर
एक भावनात्मक लेकिन संदेशपूर्ण पोस्ट साझा की।
उन्होंने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर लिखा —
“पापा हमेशा कहते थे, गुनाह मत करो, गुनाह मत सहो।
जीना है तो मरना सीखो, हर कदम पर लड़ना सीखो।”
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार,
यह बयान राजनीतिक आत्मनिर्भरता और संघर्ष की भावना का प्रतीक है,
जो सीट बंटवारे के मौजूदा परिदृश्य में लोजपा की आक्रामक रणनीति को भी दर्शाता है।
एनडीए में तेज़ बैठकों का दौर
उधर, भाजपा और सहयोगी दलों के बीच
सीट बंटवारे को लेकर कई दौर की चर्चाएँ जारी हैं।
मंगलवार को बिहार चुनाव प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान ने
चिराग पासवान के साथ इस विषय पर विस्तृत बैठक की।
इस बैठक में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े
(जो बिहार के संगठन प्रभारी हैं) और
राज्य सरकार के मंत्री मंगल पांडे भी मौजूद थे।
सूत्रों के अनुसार,
एनडीए में सीटों के अंतिम फार्मूले पर अभी भी संघर्ष और संतुलन की राजनीति जारी है।
मांझी और चिराग की संकेतभरी सोशल मीडिया पोस्टें यह दिखाती हैं कि
बातचीत की मेज़ पर कविता और कूटनीति दोनों साथ-साथ चल रही हैं।

