लेखक – अज़हर उमरी
(वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक चिंतक, शिक्षाविद)
सिख धर्म के दसवें गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज का प्रकाश पर्व केवल एक ऐतिहासिक स्मृति नहीं, बल्कि न्याय, साहस, त्याग और आत्मसम्मान के मूल्यों को पुनर्जीवित करने का अवसर है। 22 दिसंबर 1666 को पटना साहिब में जन्मे गुरु गोबिंद सिंह जी ने अल्पायु में ही यह स्पष्ट कर दिया था कि धर्म केवल उपासना नहीं, बल्कि अत्याचार के विरुद्ध खड़े होने का साहस भी है।
गुरु तेग बहादुर जी की शहादत के बाद मात्र नौ वर्ष की आयु में गुरु पद संभालने वाले गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने संपूर्ण जीवन को धर्म की रक्षा और मानव स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने न केवल आध्यात्मिक चेतना को जाग्रत किया, बल्कि समाज को अन्याय के विरुद्ध संगठित भी किया।
खालसा पंथ की स्थापना: समानता और स्वाभिमान का घोष
1699 में बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना गुरु गोबिंद सिंह जी के जीवन का ऐतिहासिक मोड़ था। उन्होंने जाति, वर्ग और भेदभाव की दीवारों को तोड़ते हुए सिख समाज को समानता, अनुशासन और साहस के सूत्र में बांधा। ‘सिंह’ और ‘कौर’ की परंपरा ने यह संदेश दिया कि समाज में हर व्यक्ति सम्मान और समान अधिकार का अधिकारी है।
पांच ककार—केश, कंघा, कड़ा, कृपाण और कच्छा—के माध्यम से उन्होंने सिख जीवन को नैतिकता, आत्मसंयम और न्यायप्रियता से जोड़ा।
धर्म और मानवता के लिए अद्वितीय बलिदान
गुरु गोबिंद सिंह जी का जीवन त्याग की चरम मिसाल है। उनके चारों साहिबज़ादों की शहादत भारतीय इतिहास की सबसे मार्मिक और प्रेरणादायक घटनाओं में से एक है। बड़े साहिबज़ादों—अजीत सिंह और जुझार सिंह—ने युद्धभूमि में बलिदान दिया, जबकि छोटे साहिबज़ादों—जोरावर सिंह और फतेह सिंह—ने दीवार में ज़िंदा चिनवाए जाने के बावजूद धर्म से समझौता नहीं किया।
यह बलिदान केवल सिख इतिहास नहीं, बल्कि समूची मानवता की चेतना का हिस्सा है।
गुरु ग्रंथ साहिब को गुरु घोषित करना: अद्वितीय विरासत
1708 में गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरु ग्रंथ साहिब को सिखों का शाश्वत गुरु घोषित कर एक क्रांतिकारी निर्णय लिया। इससे उन्होंने यह स्पष्ट किया कि सिख धर्म किसी व्यक्ति नहीं, बल्कि वाणी, विचार और मूल्य पर आधारित है।
आज के भारत के लिए गुरु गोबिंद सिंह जी का संदेश
आज जब समाज विभाजन, असहिष्णुता और भय के दौर से गुजर रहा है, गुरु गोबिंद सिंह जी का जीवन हमें सिखाता है कि
“डर के विरुद्ध साहस, अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध और भेदभाव के विरुद्ध समानता” ही सच्चा धर्म है।
उनका संदेश सीमाओं में बंधा नहीं है—वह हर उस व्यक्ति के लिए है जो न्याय, स्वतंत्रता और मानव गरिमा में विश्वास करता है।
प्रकाश पर्व: संकल्प का दिन
गुरु गोबिंद सिंह जी का प्रकाश पर्व केवल दीप जलाने का पर्व नहीं, बल्कि यह संकल्प लेने का दिन है कि हम
सत्य के साथ खड़े रहेंगे, कमजोर के पक्ष में आवाज़ उठाएंगे और अन्याय के सामने कभी नतमस्तक नहीं होंगे।
यही गुरु गोबिंद सिंह जी को सच्ची श्रद्धांजलि है।

