अलीगढ़/आगरा: प्रख्यात इतिहासविद् प्रो. इरफ़ान हबीब ने कहा है कि इतिहास केवल साक्ष्यों और तथ्यों पर आधारित होता है और इसके साथ छेड़छाड़ समाज के लिए हानिकारक है। उन्होंने ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण और पुरातात्विक धरोहरों के महत्व पर जोर दिया।

इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करना अनुचित
अलीगढ़ में सिविल सोसाइटी ऑफ़ आगरा के प्रतिनिधियों से चर्चा करते हुए प्रो. हबीब ने कहा कि सरकारों में इतिहास को राजनीतिक दृष्टिकोण से पेश करने की प्रवृत्ति रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इतिहासकार तथ्यों का निर्माण नहीं कर सकते, उन्हें स्थापित कर प्रमाणित करना आवश्यक है।
“Historians must prove by establishing facts, they can’t manufacture facts,” प्रो. हबीब ने कहा।
उन्होंने भाजपा सरकार (1998-2004) के दौरान भारतीय इतिहास के तथ्यों और तारीखों के आविष्कार का उदाहरण भी दिया।

अलीगढ़ में हेरिटेज स्मारक और संरक्षण की आवश्यकता
प्रो. हबीब ने अलीगढ़ जनपद में मराठा और रियासत कालीन पुरातात्विक संरचनाओं की स्थिति पर चिंता व्यक्त की। अधिकांश स्थल असंरक्षित हैं और कुछ तो विलुप्त हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि जो स्थल बचाए जा सकते हैं, उन्हें तुरंत संरक्षण की आवश्यकता है।
“मुख्य स्थल के रूप में केवल किले का कुछ भाग और गेट ही बचा है, इन्हें संरक्षित करना हमारी जिम्मेदारी है।”
आगरा: ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण
प्रो. हबीब ने आगरा की पुरातात्विक और ऐतिहासिक संपदा का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यहाँ की पत्रावलियाँ और दरबार वृतांत मुगल काल और उसके बाद के राजसत्ताओं का महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं।
उन्होंने पुरातत्व सर्वेक्षण की ‘Monumental Antiquities of North Western Provinces’ पुस्तिका का हवाला देते हुए बताया कि इसमें उत्तर पश्चिमी प्रांतों के स्मारकों का वर्गीकरण विस्तार से किया गया है।
फारसी भाषा की कमी और इतिहास के शोध में चुनौती
इरफ़ान हबीब ने बताया कि भारत के कई हिस्सों में मुगल और अन्य राजसत्ताओं की राजकीय भाषा फारसी थी। अब फारसी जानने वाले शोधकर्ताओं की कमी के कारण इतिहास के अन्वेषण और विश्लेषण की प्रक्रिया कठिन हो गई है।
ब्रज क्षेत्र का ऐतिहासिक अध्ययन
प्रो. हबीब ने अपनी पुस्तक “मुगल काल में ब्रज भूमि: राज्य, किसान और गोसाईं” का हवाला दिया। यह पुस्तक ब्रज क्षेत्र के आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक जीवन पर आधारित गहन शोध है।
तेरह मोरी बांध और ग्रामीण जलसंकट
सिविल सोसाइटी ऑफ़ आगरा के सचिव अनिल शर्मा ने बताया कि प्रो. हबीब के आगरा आगमन का एक उद्देश्य तेरह मोरी बांध की उपयोगिता पर विमर्श करना भी था। यह जलसंरचना दशकों से उपेक्षित रही है, लेकिन अब इसे फंक्शनल बनाने की योजना है।
“इस बांध को विश्वदाय स्मारक फतेहपुर सीकरी का अंतरिम भाग माना गया है और सिंचाई विभाग को इसे कार्यान्वित करने की अनुमति दी गई है।”

