मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद में अंतरराष्ट्रीय शैक्षिक सम्मेलन!
अलीगढ़ : “सभ्यताओं के विकास में भाषाओं की अहम भूमिका होती है। भारत के परिप्रेक्ष्य में यहाँ की बहु भाषायी परंपरा और बहुभाषिक सहअस्तित्व सामाजिक और सांस्कृतिक समन्वय को आधार देकर उसे मजबूत बनाती है। भारतीय भाषाओं के नज़रिए से विचार करें, तो संस्कृत, हिंदी और उर्दू भारतीय उपमहाद्वीप की ऐसी तीन प्रमुख भाषाएँ हैं, जिन्होंने न केवल अपने-अपने साहित्य और अभिव्यक्ति के माध्यम से, बल्कि परस्पर संवाद, भावों के परस्पर आदान-प्रदान और सांस्कृतिक मूल्यों की साझेदारी द्वारा भी गहरे स्तर पर सभ्यता का समन्वय और निर्माण किया है।” यह विचार अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर, शंभुनाथ तिवारी ने मौलाना आज़ाद उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद द्वारा “उर्दू, हिंदी, अरबी और फ़ारसी – भाषाई, साहित्यिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक आदान-प्रदान में सभ्यतागत संगम” विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के अकादमिक सत्र में बतौर मुख्यवक्ता व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि भारतीय भाषायी परंपरा की सजीव धारा में संस्कृत, हिन्दी और उर्दू परस्पर संवाद करती हुई सभ्यता के विराट स्वरूप का निर्माण करती हैं। संस्कृत साहित्यिक एवं सांस्कृतिक धारा का हिन्दी–उर्दू में प्रसार दिखाई देता है, जहाँ संस्कृत ने हिन्दी को जीवनदायिनी ऊर्जा प्रदान की। हिन्दी ने लोकधारा और भक्ति आंदोलन के माध्यम से भारतीय समाज को एक सूत्र में बाँधने का कार्य किया। उर्दू भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रतीक बनी, जिसने फ़ारसी–अरबी–तुर्की प्रभावों को भारतीय लोक और भावभूमि के साथ जोड़कर एक नई साहित्यिक परंपरा रची। संस्कृत साहित्य की बहुत सी प्रमुख कृतियाँ अनूदित रूप में अँगरेजी सहित विश्व की अनेक प्रमुख भाषाओं के विशाल पाठक समुदाय में लोकप्रिय हो चुकी हैं। पारस्परिक सांस्कृतिक आदान-प्रदान एवं एकदूसरे को जानने-समझने की दृष्टि से संस्कृत साहित्य का बहुत सा हिस्सा अनुवादों के ज़रिए अन्य भाषाओं के साहित्य में पहुँच कर बहुत लोकप्रिय हुआ।
भाषा चाहे कोई हो, पर सांस्कृतिक दृष्टि से भाव सभी भाषाओं में एक ही होता है। भाषाओं के आपसी आदान-प्रदान से भावाभिव्यक्ति का यह सौंदर्य सांस्कृतिक सहअस्तित्व और समन्वयात्मकता की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। इस नज़रिए से विचार करें, तो संस्कृत- हिंदी-उर्दू तीनों भाषाओं का संबंध केवल भाषिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि साहित्यिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक स्तर पर भी गहरा है। हिन्दी और उर्दू में संस्कृत के शब्द, मिथक और प्रतीक व्यापक रूप से दिखाई देते हैं, वहीं उर्दू और हिन्दी का साझा साहित्य भारतीय संस्कृति की बहुरंगी तस्वीर प्रस्तुत करता है। संस्कृत साहित्य की अनेक उक्तियों/ मार्मिक रचनाओं के भाव को हिंदी -उर्दू ने यथावत ग्रहण किया है।
भारतीय बहुलतावाद और भाषाई-सांस्कृतिक सहअस्तित्व हमारी सांस्कृतिक एकता की पहचान हैं। सामाजिक-साम्प्रदायिक सौहार्द में भाषाओं के योगदान को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारतीय भाषाओं की प्रासंगिकता सदैव विद्यमान रहेगी। इस आदान–प्रदान ने भारतीय समाज में बहुलता, सहअस्तित्व और सांप्रदायिक सौहार्द की भावना को सुदृढ़ किया है। यही भाषाई और साहित्यिक संगम भारतीय सभ्यता को सहसमन्वय की अद्वितीय पहचान प्रदान करता है।

