
🔴 वह अहिंसा, जो हथियारों के बीच जन्मी
यह आमतौर पर बताया जाता है कि गफ्फार ख़ान अहिंसा के पुजारी थे।
लेकिन वह सच कम ही सामने आता है कि यह अहिंसा किसी सुरक्षित आश्रम में नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे हिंसक क़बाइली इलाक़े में पैदा हुई थी।
पख़्तून समाज, जहाँ बदले को इबादत समझा जाता था, वहाँ एक व्यक्ति ने कहा —
“बदला कमज़ोरी है, सब्र सबसे बड़ी बहादुरी है।”
यह सिर्फ़ विचार नहीं था, यह सामाजिक आत्महत्या जैसा फ़ैसला था।
🔴 वह फ़ौज जो बिना हथियार के थी
इतिहास बताता है कि उन्होंने ख़ुदाई ख़िदमतगार बनाई।
लेकिन यह नहीं बताया जाता कि यह दुनिया की इकलौती ऐसी ‘फ़ौज’ थी, जो बिना हथियार के ब्रिटिश साम्राज्य से टकरा गई।
इस फ़ौज के लोग शपथ लेते थे:
झूठ नहीं बोलेंगे
हिंसा नहीं करेंगे
ज़ुल्म सहेंगे, मगर ज़ुल्म नहीं करेंगे
सोचिए — अंग्रेज़ों की गोलियों के सामने सीना खोलकर खड़े होना, यह अहिंसा नहीं, यह अतुलनीय साहस था।
🔴 कांग्रेस ने उन्हें अपनाया, लेकिन समझा नहीं
गांधी और नेहरू से उनकी नज़दीकी प्रसिद्ध है।
पर वह सच्चाई कम कही जाती है कि कांग्रेस भी उन्हें पूरी तरह समझ नहीं पाई।
गफ्फार ख़ान राष्ट्रवाद नहीं, इंसानियत की बात करते थे।
उनके लिए आज़ादी सिर्फ़ अंग्रेज़ों से नहीं,
नफ़रत, संप्रदाय और सत्ता के अहंकार से भी थी।
🔴 पाकिस्तान में वह सबसे बड़े “गुनहगार” क्यों बने?
1947 के बाद का दौर गफ्फार ख़ान की ज़िंदगी का सबसे त्रासद अध्याय है।
जिस आदमी ने भारत की आज़ादी के लिए सब कुछ लुटाया,
उसे पाकिस्तान में “देशद्रोही” कहा गया।
उन्होंने कहा था —
“आपने हमें भेड़ियों के हवाले कर दिया।”
यह कोई राजनीतिक बयान नहीं था,
यह उस इंसान की चीख़ थी, जिसने आज़ादी को देखा,
मगर इंसाफ़ को नहीं।
🔴 30 साल की जेल, मगर कोई शिकायत नहीं
यह तथ्य शायद सबसे कम पढ़ा गया है —
ख़ान अब्दुल गफ्फार ख़ान ने अपनी ज़िंदगी के लगभग 30 साल जेल में बिताए।
ब्रिटिश शासन और बाद में पाकिस्तान —
दोनों ने उन्हें कैद किया।
लेकिन इतिहास में ऐसा कोई बयान नहीं मिलता जिसमें उन्होंने बदले या हिंसा की बात की हो।
🔴 मौत भी सरहद नहीं मान सकी
1988 में जब उनका इंतकाल हुआ,
तो उनकी वसीयत थी कि
“मुझे अफ़ग़ानिस्तान में दफ़न करना, ताकि सरहदें भी शर्मिंदा हों।”
उनकी जनाज़े के दौरान अफ़ग़ानिस्तान में युद्धविराम हुआ —
यह किसी राजा या जनरल को नसीब नहीं हुआ।
🔴 आज का सवाल
आज जब राजनीति नफ़रत से वोट बटोरती है,
जब अहिंसा को कायरता समझा जाता है,
तो सवाल उठता है —
अगर ख़ान अब्दुल गफ्फार ख़ान आज ज़िंदा होते,
तो क्या हम उन्हें फिर जेल में डाल देते?
शायद हाँ।
क्योंकि सच हमेशा सत्ता को चुभता है।
✍️ लेखक: अज़हर उमरी
(वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक)

