लेखक।। अज़हर उमरी (वरिष्ठ पत्रकार)
3 अप्रैल 1325 ईस्वी (18 रबी अल-थानी 725 हिजरी) की सुबह, दिल्ली की सरज़मीं ने एक ऐसे रूहानी सूरज को खो दिया, जिसकी रोशनी आज भी दिलों को रोशन करती है — हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया। लगभग 86–87 साल की उम्र में उनका विसाल हुआ, लेकिन उनकी तालीमात और इंसानियत का पैग़ाम सदियों से ज़िंदा है।
✨ असर ऐसा कि दिल बदल गए
14वीं सदी के मशहूर इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी लिखते हैं कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का असर दिल्ली के लोगों पर इतना गहरा था कि लोगों की सोच ही बदल गई।
दुनियावी भाग-दौड़ से हटकर लोग इबादत, सादगी और तसव्वुफ़ की तरफ मायल होने लगे।
🏡 बदायूं से दिल्ली तक का सफर
हज़रत की पैदाइश बदायूं में हुई। बचपन में ही वालिद का साया उठ गया, और मां बीबी जुलेखा के साथ वह दिल्ली आ गए।
मुश्किल हालात के बावजूद, उन्होंने इल्म और रूहानियत का दामन नहीं छोड़ा।
उनकी जिंदगी का जिक्र आइन-ए-अकबरी में मिलता है, जिसे अबुल फ़ज़ल इब्न मुबारक ने लिखा।
🤲 बाबा फरीद से रूहानी रिश्ता
20 साल की उम्र में वह अजोधन (पाकपट्टन) पहुंचे, जहां उनकी मुलाकात महान सूफी संत बाबा फरीद से हुई।
यहीं से उनकी रूहानी यात्रा को नई दिशा मिली।
बाबा फरीद ने उन्हें अपना खलीफा (जानशीन) बनाया — यह उनके मकाम की सबसे बड़ी गवाही थी।
🕌 गयासपुर की खानकाह — इंसानियत का केंद्र
दिल्ली में उन्होंने गयासपुर में अपनी खानकाह बसाई।
यह सिर्फ इबादत की जगह नहीं थी, बल्कि:
भूखों के लिए लंगर
परेशानों के लिए सुकून
और हर इंसान के लिए बराबरी का दरवाज़ा
यहां अमीर-गरीब, हिंदू-मुस्लिम — हर कोई बिना भेदभाव के आता था।
🎶 अमीर खुसरो जैसे शागिर्द
उनके मुरीदों में अमीर खुसरो और नसीरुद्दीन चिराग-ए-दिल्ली जैसे नाम शामिल हैं, जिन्होंने उनके पैग़ाम को आगे बढ़ाया।
अमीर खुसरो की शायरी और संगीत आज भी उस मोहब्बत की गवाही देते हैं, जो उन्हें अपने पीर से थी।
🕊️ दरगाह — आज भी सुकून का दर
आज निजामुद्दीन दरगाह उनकी याद में आबाद है।
हर रोज़ हजारों लोग यहां आकर दुआ करते हैं, सुकून पाते हैं, और मोहब्बत का पैग़ाम लेकर लौटते हैं।
इस दरगाह की तामीर में मुहम्मद बिन तुगलक और फ़िरोज़ शाह तुगलक का अहम योगदान रहा।
💫 उनका पैग़ाम आज भी ज़िंदा है
हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की जिंदगी हमें सिखाती है:
मोहब्बत नफरत से बड़ी है
इंसानियत सबसे ऊपर है
और सच्चा रास्ता वही है, जो दिलों को जोड़ता है
👉 उनका मशहूर पैग़ाम था:
“हर इंसान से मोहब्बत करो, क्योंकि हर दिल में खुदा बसता है।”
🌹 आखिर में…
सदियां गुजर गईं, लेकिन हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का नाम आज भी मोहब्बत, सुकून और इंसानियत का पर्याय है।
उनकी दरगाह सिर्फ एक मकबरा नहीं, बल्कि एक जिंदा पैग़ाम है —
मोहब्बत बांटो, नफरत नहीं। ❤️

