1947 में भारत की आज़ादी के बाद देश के सामने अनेक चुनौतियाँ थीं। विभाजन की त्रासदी के बीच, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की दृष्टि केवल राजनीतिक और सामाजिक मामलों तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे देश की सीमाओं पर तैनात बहादुर सैनिकों की भलाई के लिए भी चिंतित थे।
नेहरू जी ने देखा कि युद्ध और विभाजन के कारण ब्रिटिश सेना की कैंटीन व्यवस्था बिखर चुकी थी, और सैनिकों तथा उनके परिवारों को जीवन की आवश्यक वस्तुएँ महंगे दामों पर खरीदनी पड़ती थीं। उन्होंने सोचा:
> “जो जवान सीमा पर देश की रक्षा करते हैं, उनके और उनके परिवारों के लिए हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि उन्हें जीवन की आवश्यक वस्तुएँ सस्ते दाम पर उपलब्ध कराई जाएँ।”
नेहरू जी ने इसे केवल सुविधा नहीं, बल्कि सैनिकों के प्रति राष्ट्र की कृतज्ञता का प्रतीक माना।
इस विचार को साकार करने के लिए 1 जनवरी 1948 को आज़ाद भारत में कैंटीन स्टोर्स डिपार्टमेंट (CSD) की स्थापना हुई। शुरुआत में यह तीन साल के प्रयोग के रूप में शुरू हुआ, जिसमें केवल 48 लाख रुपये की पूंजी थी। बंबई, कलकत्ता, मरादनगर (बाद में दिल्ली) और बैंगलोर में चार क्षेत्रीय डिपो खोले गए।
शुरुआत में कुछ सौ कैंटीन यूनिट खोली गईं, जहाँ सैनिकों को केवल बुनियादी ज़रूरत की वस्तुएँ मिलती थीं। लेकिन नेहरू जी का विज़न केवल दुकान खोलने तक सीमित नहीं था। वे चाहते थे कि हर सैनिक, हर पूर्व सैनिक और उनका परिवार गुणवत्ता वाली वस्तुएँ बाज़ार से कम दाम में प्राप्त कर सके।
1950 में, तीन साल के प्रयोगात्मक काल के सफल परिणामों के बाद सरकार ने इसे स्थायी सरकारी उपक्रम बना दिया। यह नेहरू जी की दूरदर्शिता और सैनिकों के प्रति सम्मान का स्पष्ट प्रमाण था।
आज जब कोई सैनिक कैंटीन में जाता है, शायद उसे यह एहसास न हो कि यह सुविधा नेहरू जी के सपने और उनकी मेहनत का परिणाम है, लेकिन हर बार यह उनके विज़न को साकार करती है।

