पटना। बिहार की राजनीति में इन दिनों राज्यसभा चुनाव की पांचवीं सीट को लेकर जबरदस्त सियासी हलचल मची हुई है। आंकड़ों का गणित ऐसा है कि न तो NDA पूरी तरह निश्चिंत है और न ही महागठबंधन। इसी बीच ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने अपना उम्मीदवार उतारने का ऐलान कर दोनों खेमों को चौंका दिया है।
NDA का गणित कहाँ अटक रहा है?
NDA में शामिल प्रमुख दल भारतीय जनता पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) अपने विधायकों के दम पर चार उम्मीदवारों को राज्यसभा भेजने की स्थिति में हैं। लेकिन पांचवीं सीट पर मुकाबला कठिन हो जाता है।
सहयोगी दलों में
लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के 19,
हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के 5,
और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के 4 विधायक हैं।
मुख्य दलों के बचे 10 वोट जोड़कर कुल संख्या 38 तक पहुंचती है, जबकि जीत के लिए 41 वोट जरूरी हैं। यानी NDA को 3 वोटों की कमी साफ दिखाई दे रही है।
महागठबंधन भी नहीं मजबूत स्थिति में
दूसरी ओर महागठबंधन में
राष्ट्रीय जनता दल,
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
और वाम दल शामिल हैं।
इनके पास भी पांचवीं सीट के लिए जरूरी आंकड़ा स्वतः नहीं बन रहा है। ऐसे में निर्दलीय या छोटे दलों का समर्थन निर्णायक बन सकता है।
AIMIM का बड़ा संकेत
AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी द्वारा उम्मीदवार उतारने के फैसले को राजनीतिक जानकार महज प्रतीकात्मक कदम नहीं मान रहे। सूत्रों के मुताबिक यह कदम 2025 के विधानसभा चुनावों से पहले अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने और मुस्लिम मतदाताओं के बीच स्पष्ट संदेश देने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि AIMIM का यह दांव सीधे तौर पर महागठबंधन के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश भी हो सकता है। वहीं NDA के लिए भी यह स्थिति असहज करने वाली है, क्योंकि क्रॉस वोटिंग या छोटे दलों की नाराजगी समीकरण बदल सकती है।
क्या है बड़ा गेम?
सूत्र बताते हैं कि AIMIM फिलहाल जीत से ज्यादा अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने और सत्ता पक्ष व विपक्ष दोनों पर दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। यह कदम भविष्य के गठबंधन समीकरणों के लिए भी जमीन तैयार कर सकता है।
अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में कौन सा खेमा अतिरिक्त समर्थन जुटाने में सफल होता है और क्या AIMIM अंत तक मैदान में डटी रहती है या कोई नया राजनीतिक मोड़ सामने आता है।

