लेखक।। अज़हर उमरी (वरिष्ठ पत्रकार)
रमज़ान का महीना रहमत, बरकत और इंसानियत का पैगाम लेकर आता है। यह वह वक्त होता है जब रोज़ेदार भूख-प्यास के जरिए सब्र, हमदर्दी और इंसाफ़ का सबक सीखते हैं। मगर अफसोस, बीते कुछ वर्षों में रोज़ा-इफ्तार अब सिर्फ इबादत या इंसानी जुड़ाव का ज़रिया नहीं रह गया, बल्कि यह धीरे-धीरे सियासी प्रदर्शन और ताकत दिखाने का मंच बनता जा रहा है।
भारत में लगभग हर बड़ी राजनीतिक पार्टी — चाहे वह समाजवादी पार्टी हो, या कांग्रेस — रमज़ान के दौरान भव्य इफ्तार पार्टियों का आयोजन करती है। इन आयोजनों में रोज़ेदारों से ज्यादा कैमरे, आम लोगों से ज्यादा खास मेहमान और दुआओं से ज्यादा सियासी संदेश नजर आते हैं।
🍽️ इफ्तार या इमेज बिल्डिंग?
इफ्तार पार्टियों में सजे लजीज़ पकवान, चमचमाती रोशनी और बड़ी-बड़ी शख्सियतों की मौजूदगी यह सवाल खड़ा करती है कि क्या यह आयोजन वाकई रूहानी मकसद के लिए हैं, या फिर यह सिर्फ वोट बैंक की राजनीति और इमेज बिल्डिंग का हिस्सा बन चुके हैं?
रोज़ा हमें सिखाता है कि भूखे का दर्द समझें, गरीब की मदद करें, लेकिन इफ्तार पार्टियों में अक्सर वही लोग नजर आते हैं जो पहले से ही ताकतवर और प्रभावशाली होते हैं। आम रोज़ेदार, मजदूर या जरूरतमंद कहीं पीछे छूट जाते हैं।
🤝 सियासत और संवेदनशीलता
यह भी सच है कि इफ्तार पार्टियां सामाजिक सौहार्द और एकता का प्रतीक बन सकती हैं, जहां अलग-अलग धर्मों और विचारधाराओं के लोग एक साथ बैठकर रोज़ा खोलें। लेकिन जब यह आयोजन सिर्फ फोटो-ऑप और राजनीतिक संदेश तक सीमित हो जाए, तो इसकी असल रूह कहीं खो जाती है।
📊 जनता क्या सोचती है?
आज का जागरूक नागरिक इन आयोजनों को ध्यान से देख रहा है। वह यह समझने लगा है कि कौन सी पार्टी सच में समाज के साथ खड़ी है और कौन सिर्फ मौके का फायदा उठा रही है। अब वक्त आ गया है कि राजनीतिक दल दिखावे से आगे बढ़कर असल काम करें — जैसे गरीबों के लिए इफ्तार, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार के अवसर।
🕌 असली इफ्तार क्या है?
असल इफ्तार वह है जहां
किसी गरीब का चूल्हा जले
किसी जरूरतमंद को खाना मिले
और समाज में मोहब्बत और बराबरी का पैगाम फैले
✍️ Times of Taj की अपील
“Times of Taj” तमाम राजनीतिक पार्टियों से अपील करता है कि इफ्तार को सियासी मंच नहीं, बल्कि इंसानियत की सेवा का जरिया बनाएं। अगर इफ्तार पार्टी करनी ही है, तो उसे गरीबों, मजदूरों और बेसहारा लोगों के साथ जोड़ें — तभी यह रमज़ान के असल मकसद के करीब होगी।
रोज़ा-इफ्तार की असल खूबसूरती सादगी, बराबरी और इंसानियत में है, न कि चकाचौंध और सियासी दिखावे में। अगर सियासत को इसमें शामिल होना है, तो उसे नीयत और नियामत दोनों को साफ रखना होगा।

