नई दिल्ली, सिंधी समाज अपनी लुप्त होती संस्कृति, भाषा और परंपराओं को बचाने तथा भारत में सिंधी समाज के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक योगदान को उजागर करने के लिए अब पहले से अधिक संगठित रूप में आगे आ रहा है। समाज के प्रतिनिधियों का स्पष्ट कहना है कि यदि वे अपनी एकता और सामूहिक शक्ति का प्रदर्शन नहीं करेंगे, तो नीति-निर्माण के स्तर पर उनकी चिंताओं की अनदेखी जारी रहेगी, जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए सिंधी पहचान खतरे में पड़ सकती है।
विज्ञान भवन में देश का सबसे बड़ा सिंधी सम्मेलन
हाल ही में नई दिल्ली के विज्ञान भवन में सिंधी समाज की प्रमुख संस्थाओं द्वारा अब तक का सबसे बड़ा और भव्य सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें देश के रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह सहित कई वरिष्ठ राजनेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न सिंधी संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कार्यक्रम में रक्षा मंत्री ने पाकिस्तान के सिंध प्रांत को भारत में शामिल करने संबंधी ऐतिहासिक बयान दिया, जिसे समाज में उत्साह और उम्मीद के साथ देखा गया।
विभाजन ने छीन ली भाषा और पहचान
सिंधी कौंसिल ऑफ इंडिया (उत्तर भारत) के अध्यक्ष श्री अशोक लालवानी ने कहा कि विभाजन के समय पूरा सिंध पाकिस्तान में चला गया, और हिन्दू सिंधियों को अपनी भूमि, संपत्ति और आजीविका छोड़कर भारत के अलग-अलग हिस्सों में बसना पड़ा। नई परिस्थितियों में नई संस्कृति अपनाने के कारण सिंधी भाषा और परंपराओं का क्षय तेज़ी से बढ़ा है।
उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता है कि सिंधी समाज अपनी एकजुटता दिखाए, अन्यथा “सिंधी संस्कृति और पहचान का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।”
सिंधु समाज दिल्ली की प्रमुख माँगें
सिंधु समाज दिल्ली के अध्यक्ष श्री जगदीश नागरानी, महासचिव श्री नरेश बेलानी और कोषाध्यक्ष श्री कमल टेकचंदानी ने मिलकर कई महत्वपूर्ण सुझाव रखे, जिनमें प्रमुख हैं—
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सिंधी विकास बोर्ड का गठन
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सिंधी बहुल राज्यों में सिंधु भवन की स्थापना
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सिंधी साहित्य और अकादमियों का गठन
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सिंधी हिंदुओं को आरक्षण सूची (SC/ST/OBC) में शामिल करना
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स्थानीय राजनीति में युवा सिंधियों के लिए आरक्षण
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समाज के युवाओं के लिए सिविल सेवा मार्गदर्शन केंद्र
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गणतंत्र दिवस परेड में सिंधी झांकी शामिल करना
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CAA के अंतर्गत सिंधी हिंदुओं को नागरिकता प्रदान करना
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विभाजन के समय दिए गए सिंधी कॉलोनियों की दयनीय स्थिति का सुधार और मालिकाना हक दिलाना
“नए राज्य की मांग नहीं, बस हमारी पहचान सुरक्षित रहे”
सिंधी पंचायत पटेल नगर के प्रमुख श्री जगदीश झुरानी ने स्पष्ट किया कि सिंधी समाज किसी नए राज्य के गठन की मांग नहीं कर रहा, बल्कि भाषा, संस्कृति और खान-पान को संरक्षित रखने के लिए विशेष अधिकार चाहता है।
उन्होंने कहा कि सरकार उन्हें “सिंध” नाम से कोई खाली जगह उपलब्ध कराए ताकि सिंधी समुदाय अपनी विरासत को पुनर्जीवित एवं संरक्षित कर सके।
“सिर्फ आश्वासन नहीं, स्थायी समाधान का समय”
सेंट्रल सिंधी महापंचायत (दिल्ली एनसीआर) के वरिष्ठ उपाध्यक्ष श्री मोहन आहूजा ने कहा कि रक्षा मंत्री के बयान से समाज उत्साहित है, पर now समाज को केवल आश्वासनों पर निर्भर रहने के बजाय स्थायी आधार और ठोस सरकारी नीतियों की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि “1947 के बाद से सिंधी समाज लगातार इंतजार कर रहा है कि एक दिन हिंद में सिंध राज्य या एक मान्यता प्राप्त सांस्कृतिक आधार मिलेगा—यह प्रतीक्षा आखिर कब तक?”
“एक कार्यक्रम से नहीं, निरंतर आंदोलनों से बदलेगी स्थिति”
दिले-सिंध के संपादक श्री महेश छाबरिया, समाजसेवी श्री लाल खेमानी और श्री गौतम थावानी ने सभी सिंधी संगठनों से अपील की कि वे संवैधानिक मार्ग अपनाते हुए लगातार सरकार और जनमानस का ध्यान इन मुद्दों की ओर आकर्षित करते रहें।
उन्होंने कहा कि “एक सम्मेलन करके चुप हो जाना समाधान नहीं है; समाज को जागरूक करने एवं अपने अधिकारों के लिए निरंतर प्रयास ज़रूरी है।”
“मीडिया के माध्यम से हर आवाज़ को मंच देंगे”
श्री महेश छाबरिया की अपील को स्वीकारते हुए, सिंधी कौंसिल ऑफ इंडिया (उत्तर भारत) के अध्यक्ष एवं मीडिया प्रेस क्लब के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अशोक लालवानी ने आश्वासन दिया कि सिंधी समाज की आवाज बुलंद करने के लिए नियमित प्रेसवार्ता और कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
उन्होंने सिंधी पंचायतो एवं समाजसेवियों को आमंत्रित करते हुए कहा कि वे अपने सुझाव और विचार शेयर करें—मीडिया के माध्यम से उन्हें अधिक से अधिक लोगों और सरकार तक पहुँचाया जाएगा।

