लेखक – अज़हर उमरी
(वरिष्ठ पत्रकार )
दुनिया की राजनीति में बयानबाज़ी और आरोप-प्रत्यारोप कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब झूठ को सच की तरह पेश किया जाने लगे और मीडिया उसकी आलोचना करने के बजाय ताली बजाने लगे, तब लोकतंत्र के लिए यह एक गंभीर संकट बन जाता है। आज इसी संदर्भ में डोनाल्ड ट्रंप और तथाकथित “गोदी मीडिया” की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।
डोनाल्ड ट्रंप अपने बयानों और विवादित दावों के लिए पहले से ही जाने जाते रहे हैं। उनके कार्यकाल के दौरान और उसके बाद भी कई बार उनके बयानों की सच्चाई पर प्रश्नचिह्न लगे। लेकिन समस्या केवल उनके बयान देने तक सीमित नहीं है। असली चिंता का विषय यह है कि कुछ मीडिया संस्थान इन बयानों की तथ्यात्मक जांच करने के बजाय उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं।
मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। उसका काम सत्ता से सवाल करना, जनता के सामने सच लाना और निष्पक्षता बनाए रखना होता है। लेकिन जब मीडिया का एक वर्ग सत्ता या किसी नेता के प्रति अत्यधिक झुकाव दिखाने लगे, तो वह अपनी मूल जिम्मेदारी से भटक जाता है। यही स्थिति “गोदी मीडिया” शब्द को जन्म देती है, जो उस मीडिया के लिए इस्तेमाल होता है जो निष्पक्षता छोड़कर एकतरफा समर्थन करता है।
आज सूचना का युग है, जहां हर खबर कुछ ही सेकंड में लाखों लोगों तक पहुंच जाती है। ऐसे में अगर झूठ या अधूरी जानकारी को बार-बार दोहराया जाए, तो वह सच जैसा प्रतीत होने लगता है। यह न केवल जनता को भ्रमित करता है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों को भी कमजोर करता है।
यह जरूरी है कि मीडिया अपनी भूमिका को समझे और सत्ता या किसी व्यक्ति विशेष के प्रभाव से ऊपर उठकर काम करे। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्य की खोज और उसे निर्भीकता से प्रस्तुत करना है, न कि किसी के पक्ष में माहौल बनाना।
अंततः, समस्या केवल किसी एक नेता के झूठ बोलने की नहीं है, बल्कि उस तंत्र की है जो उन झूठों को बिना सवाल किए स्वीकार करता है और जनता तक पहुंचाता है। जब तक मीडिया अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाएगा, तब तक सच और झूठ के बीच की रेखा धुंधली होती रहेगी।

