“छिपी प्रतिभा से उभरी नई प्रेरणा: शमीम बानो बनीं विश्वविद्यालय की नई मिसाल”
जरदोज़ी कला में नई उड़ान — शमीम बानो के मार्गदर्शन में सात दिवसीय कार्यशाला संपन्न, अब बढ़ेगी और 7 दिन
आगरा। डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा के गृह विज्ञान संस्थान के महिला अध्ययन केंद्र में आयोजित सात दिवसीय जरदोज़ी कढ़ाई कार्यशाला का सातवां दिन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस कार्यशाला की प्रेरणा स्रोत विश्वविद्यालय की माननीय कुलपति प्रोफेसर आशु रानी रहीं, जिन्होंने अपने कार्यालय में कार्यरत 2011 से सेवापरत एक फोर्थ-क्लास कर्मचारी — शमीम बानो के असाधारण हुनर को पहचान कर उसे मंच प्रदान करने का महत्वपूर्ण कदम उठाया।

प्रो. आशु रानी ने बताया कि शमीम बानो वर्षों से अपने कार्य के साथ-साथ पारंपरिक कढ़ाई का विशिष्ट कौशल रखती हैं, परंतु आर्थिक परिस्थितियों के कारण उनका हुनर सीमित दायरे तक ही रह गया था। प्रतिभा को पहचानते हुए कुलपति ने उन्हें प्रशिक्षक के रूप में आगे बढ़ाने का निर्णय लिया और यह सात दिवसीय कार्यशाला आयोजित करवाई, जिससे उनकी कला अधिक से अधिक छात्राओं और महिलाओं तक पहुंच सके और वह स्वयं भी सशक्त बनें।
शमीम बानो का रचनात्मक योगदान बना आकर्षण का केंद्र
शमीम बानो ने अपनी गहरी समझ और वर्षों के अनुभव के साथ छात्राओं को चौपेल, मोती, गिजाई, सितारा और डोरा की सहायता से विभिन्न प्रकार की पारंपरिक जरदोज़ी कढ़ाई सिखाई। उन्होंने बेहद बारीकी से डिजाइन बनाना, फ्रेम सेट करना और विशेष तकनीकों का प्रशिक्षण दिया। उनके उत्साह और संवेदनशील मार्गदर्शन से छात्राओं में नई ऊर्जा और रचनात्मकता का संचार हुआ।

शमीम बानो के कहना है की छात्रों को सिखाना उन्हें बहुत भाता है. आभार करते हुए उन्होंने बताया की कुलपति की नजर ने उनकी ज़िन्दगी बदली और अब उन्हें विश्वविद्यालय ही नहीं बाहर भी सब लोग पहचानते और तारीफ करते हैँ. कुलपति जी ने साधारण सी कर्मचारी की कला को पहचान कर बनी आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है.
छात्राओं ने बड़े उत्साह के साथ अभ्यास करते हुए कई आकर्षक डिज़ाइन तैयार किए। उनकी बढ़ती रुचि और मांग को देखते हुए संस्थान ने इस कार्यशाला को अगले 7 दिनों के लिए और बढ़ाने का निर्णय लिया है।
अब गांवों और बस्तियों की महिलाओं को भी इसमें शामिल किया जाएगा, ताकि वह इस कला को सीखकर आत्मनिर्भर बन सकें और अपना स्वरोजगार स्थापित कर सकें।
महिलाओं के सशक्तिकरण की ओर बड़ा कदम
यह कार्यशाला न केवल कला सीखने का माध्यम बनी, बल्कि महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने और उनके भीतर आत्मविश्वास जगाने की दिशा में एक प्रभावी पहल बनकर उभरी।
कार्यक्रम का आयोजन प्रो. अचला गक्खड़ द्वारा डॉ. संघमित्रा गौतम एवं डॉ. अनुपमा गुप्ता द्वारा संचालित कराया गया।
इस पहल ने साबित कर दिया कि यदि प्रतिभा को पहचान मिले तो वह न केवल स्वयं आगे बढ़ती है, बल्कि कई और लोगों के जीवन में उजाला भर सकती है—जैसा कि शमीम बानो की रचनात्मक क्षमता और समर्पण ने इस कार्यशाला में सिद्ध किया।

