नई दिल्ली। शक्ति संगठन में होती है, किसी व्यक्ति में नहीं। प्रगतिशील शिक्षक न्याय मंच ने मुझे मान, सम्मान और अवसर दिया। नारी को यह सम्मान जीएसटीए के इतिहास में पहली बार मिला है। आज मैं उपाध्यक्ष पद पर चुनाव लड़ रही हूँ, लेकिन जीत या हार से पहले ही मेरे मंच ने मुझ पर भरोसा जताते हुए मुझे महिला मोर्चा अध्यक्ष बनाया।

महिला संख्या बल अधिक होने के बावजूद प्रतिनिधित्व में शून्य था। इस जीरो को हीरो बनाने का चुनाव इस बार है। मैं मानती हूँ कि कोई जाति, धर्म, मजहब या पहचान अध्यापक से बड़ा नहीं हो सकता। शिक्षक समाज का दर्पण हैं और समाज के स्वरूप को आकार देने का भार हमेशा उनके कंधों पर रहा है।
आचार्य चाणक्य ने सही कहा है – “प्रलय और निर्माण अध्यापक की गोद में पलते हैं।” बेहतर भविष्य, असरदार समाज और सुदृढ़ राष्ट्र के लिए शिक्षक संपूर्ण समर्पण के साथ भारत की मजबूत बुनियाद रखते हैं। यही बुनियाद जाती, पत्नी, धर्म, मजहब से ऊपर उठकर महान भारत का निर्माण करती है।

अध्यापक बनना मेरा गौरव और जीवन का वरदान
ललिता के साथ अध्यापक जोड़ना मेरे लिए गौरव और अलंकरण के समान है। मैं अपने जीवन को धन्य मानती हूँ क्योंकि अध्यापक मेरी पहचान है। यही मेरा जीवन का वरदान और अरमान था।
देश की राजधानी दिल्ली में अध्यापकों की दुर्गति देख कर पीड़ा होती है। जहां अध्यापकों पर हिंसा हुई, उन्हें लाठियों और घुसों से पीटा गया, वहां समाज का कवच ही असुरक्षित है। दुख की बात यह है कि आवाज उठाने वाला कोई नहीं। यदि अध्यापक की यूनियन मजबूत होती, तो शिक्षक मजबूर और मजदूर नहीं होते।
चुनाव लड़ने का मेरा निर्णय इसी कारण लिया गया। मेरा एकमात्र ध्येय है – सलाह देना, सहयोग करना, साथ देना और शिक्षक हित में जिम्मेदारी निभाना। शिक्षक हित ही जीवन का ध्येय है। मेरी मंजिल शिक्षकों की सेवा में ही है।
महिला नेतृत्व और नए इतिहास की ओर
चुनाव की चुनौती आसान नहीं, खासकर महिलाओं के लिए। 46 साल के इतिहास में अब तक किसी महिला को बड़ा पद नहीं मिला। इस परंपरा को बदलने के लिए मैंने चुनावी दरवाजा खटखटाया। नारी के लिए अब तक बंद जीएसटी का दरवाज़ा खुलेगा और एक कुर्सी नारी के नाम होगी।
महिला अपने घर, परिवार और समाज के लिए उत्तरदायी होती है। खुद के लिए समय कम होता है। लेकिन मैंने इस दायरे को पार कर खुद को अपने अध्यापक परिवार के लिए समर्पित किया। मुझे भरोसा है कि अध्यापक एक-दूसरे का साथ देंगे और नया इतिहास बनाएंगे।
मेरी ताकत नारी होना है। नारी शक्ति से ज्यादा ताकतवर भला और कौन हो सकता है? हम सीता, सावित्री, दुर्गा, काली, इंदिरा, सावित्रीबाई फुले, सोफिया, मल्लेश्वरी और कुंजू रानी मैरीकाम हैं। आवश्यकता है खुद को पहचानने, आगे बढ़ने और अपने हक अधिकार के लिए आवाज उठाने की।
संकल्प और समर्थन
मेरी आवाज मेरे मुद्दे और अध्यापक परिवार के लिए है। उनके उदास चेहरों को देखकर मुझे लड़ने की ऊर्जा मिलती है, थकान भाग जाती है और आशा की किरण फूट पड़ती है। मेरा संकल्प है – अध्यापक का कर्ज़ चुकाना और नये इतिहास को रचना।
यह लड़ाई नारी शक्ति, शिक्षा के पुजारी और अध्यापक साथियों के लिए है। मैं तो केवल माध्यम हूँ। जीत अध्यापकों की ही होगी। दिल्ली के हर कोने से भाई-बहन साथ दे रहे हैं, समर्थन और भरोसा बढ़ रहा है।
आँखों में तैरते सवालों का जबाब बनना है।
हाँ, मुझे शिक्षकों के लिए इंकलाब करना है।

