आगरा। सिकंदरा स्थित मस्जिद नहर वाली में जुमे के ख़ुत्बे के दौरान ख़तीब मुहम्मद इक़बाल ने नमाज़ियों को संबोधित करते हुए आख़िरत की तैयारी करने और रमज़ान मुबारक की बरकतों वाली रातों की क़दर करने की नसीहत की। उन्होंने अपनी तक़रीर में पहले के समय में इफ़्तार के वक्त बजने वाले सायरन का ज़िक्र करते हुए एक नसीहत भरी मिसाल पेश की।
ख़तीब ने कहा कि ज़्यादा समय नहीं बीता जब इफ़्तार के वक्त सायरन बजता था और लोग उसी आवाज़ के बाद रोज़ा इफ़्तार करते थे। यह सायरन इस बात का ऐलान होता था कि अब खाने-पीने का वक़्त हो गया है। लेकिन अब वह सायरन की आवाज़ सुनाई देना भी बंद हो गई है।
उन्होंने कहा कि याद रखिए, एक समय ऐसा भी आएगा जब एक सायरन की आवाज़ पूरी दुनिया में सुनाई देगी। वह सायरन दरअसल क़यामत का ऐलान होगा। उस समय लोगों से कहा जाएगा कि अब खाने-पीने का वक़्त ख़त्म हो चुका है और हर इंसान को मैदान-ए-हश्र की ओर जाना है। उस दिन खाना सिर्फ़ उन्हीं लोगों को मिलेगा जो इस दुनिया के इम्तिहान में कामयाब हुए होंगे।
ख़तीब मुहमम्द इक़बाल ने कहा कि जिस दुनिया में हम रह रहे हैं वह दरअसल एक इम्तिहानगाह है। इंसान को यहां ऐश-ओ-आराम के लिए नहीं बल्कि आज़माइश के लिए भेजा गया है। इसी हक़ीक़त को कुरआन करीम में भी बयान किया गया है। उन्होंने Quran की Surah Al-Hajj की आयत 1 और 2 का हवाला देते हुए तिलावत की:
“ऐ लोगो! अपने रब से डरो। बेशक क़यामत का ज़लज़ला बहुत बड़ी चीज़ है। जिस दिन तुम उसे देखोगे तो हर दूध पिलाने वाली अपने दूध पीते बच्चे को भूल जाएगी और हर हामिला अपना हम्ल गिरा देगी, और तुम लोगों को मदहोश देखोगे, हालाँकि वे मदहोश नहीं होंगे बल्कि अल्लाह का अज़ाब बहुत सख़्त होगा।”
उन्होंने नमाज़ियों से कहा कि कुरआन के इस साफ़ पैग़ाम के बाद हमारे पास सिर्फ़ एक ही रास्ता है कि हम अपने रब को राज़ी करें। ख़ास तौर पर रमज़ान के इन मुबारक दिनों में सच्ची तौबा, इबादत और नेक अमल के ज़रिए अल्लाह का क़ुर्ब हासिल करें।
ख़तीब ने आगे कहा कि शब-ए-क़द्र की दो रातें गुज़र चुकी हैं जबकि तीन अभी बाकी हैं, इसलिए इन क़ीमती रातों को ग़नीमत समझते हुए ज़्यादा से ज़्यादा इबादत, दुआ और इस्तिग़फ़ार करना चाहिए ताकि इंसान को दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी मिल सके।
अंत में उन्होंने दुआ की कि अल्लाह तआला हम सबको रमज़ान मुबारक की बरकतों से भरपूर फ़ायदा उठाने और आख़िरत में कामयाबी हासिल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन, या रब्बुल आलमीन।

