मुगल सम्राट हुमायूँ की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी हमीदा बानो बेगम ने उनकी याद में इस भव्य मकबरे के निर्माण का संकल्प लिया। कहा जाता है कि बेगम हमीदा बानो ने फ़ारसी वास्तुकारों को बुलाकर निर्देश दिया कि ऐसा स्मारक बनाया जाए जिसे आने वाली सदियाँ याद रखें। बाद में इस निर्माण कार्य की ज़िम्मेदारी उनके पुत्र अकबर ने संभाली और इसे भव्य रूप प्रदान किया।लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से निर्मित यह मकबरा मुगल वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। अपने अद्वितीय डिज़ाइन और ऐतिहासिक महत्व के कारण वर्ष 1993 में इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया।हुमायूँ का मकबरा परिसर में एक सुंदर मस्जिद और कई अन्य ऐतिहासिक संरचनाएँ भी मौजूद हैं। इसे “मुगलों का शयनागार” भी कहा जाता है, क्योंकि इसके विभिन्न कक्षों में मुगल परिवार के 150 से अधिक सदस्यों को दफनाया गया है।आज भी यह स्मारक देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है और भारत की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत का जीवंत प्रतीक है।
हुमायूँ का मकबरा का इतिहास जानने पहुँची TIMES OF TAJ की टीम
नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के निज़ामुद्दीन क्षेत्र में, हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह के पूर्व दिशा में स्थित भव्य ऐतिहासिक धरोहर हुमायूँ का मकबरा अपनी शानदार वास्तुकला और गौरवशाली इतिहास के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। टाइम्स ऑफ ताज की टीम, रिपोर्टर तौफीक फारूकी के नेतृत्व में, इस ऐतिहासिक स्मारक का दौरा कर इसके समृद्ध अतीत और स्थापत्य कला की जानकारी प्राप्त करने पहुँची।
मुगल सम्राट हुमायूँ की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी हमीदा बानो बेगम ने उनकी याद में इस भव्य मकबरे के निर्माण का संकल्प लिया। कहा जाता है कि बेगम हमीदा बानो ने फ़ारसी वास्तुकारों को बुलाकर निर्देश दिया कि ऐसा स्मारक बनाया जाए जिसे आने वाली सदियाँ याद रखें। बाद में इस निर्माण कार्य की ज़िम्मेदारी उनके पुत्र अकबर ने संभाली और इसे भव्य रूप प्रदान किया।लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से निर्मित यह मकबरा मुगल वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। अपने अद्वितीय डिज़ाइन और ऐतिहासिक महत्व के कारण वर्ष 1993 में इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया।हुमायूँ का मकबरा परिसर में एक सुंदर मस्जिद और कई अन्य ऐतिहासिक संरचनाएँ भी मौजूद हैं। इसे “मुगलों का शयनागार” भी कहा जाता है, क्योंकि इसके विभिन्न कक्षों में मुगल परिवार के 150 से अधिक सदस्यों को दफनाया गया है।आज भी यह स्मारक देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है और भारत की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत का जीवंत प्रतीक है।
मुगल सम्राट हुमायूँ की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी हमीदा बानो बेगम ने उनकी याद में इस भव्य मकबरे के निर्माण का संकल्प लिया। कहा जाता है कि बेगम हमीदा बानो ने फ़ारसी वास्तुकारों को बुलाकर निर्देश दिया कि ऐसा स्मारक बनाया जाए जिसे आने वाली सदियाँ याद रखें। बाद में इस निर्माण कार्य की ज़िम्मेदारी उनके पुत्र अकबर ने संभाली और इसे भव्य रूप प्रदान किया।लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से निर्मित यह मकबरा मुगल वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। अपने अद्वितीय डिज़ाइन और ऐतिहासिक महत्व के कारण वर्ष 1993 में इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया।हुमायूँ का मकबरा परिसर में एक सुंदर मस्जिद और कई अन्य ऐतिहासिक संरचनाएँ भी मौजूद हैं। इसे “मुगलों का शयनागार” भी कहा जाता है, क्योंकि इसके विभिन्न कक्षों में मुगल परिवार के 150 से अधिक सदस्यों को दफनाया गया है।आज भी यह स्मारक देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है और भारत की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत का जीवंत प्रतीक है।

