लेखक – अज़हर उमरी
इस्लामी इतिहास में कुछ घटनाएँ ऐसी हैं जो केवल इतिहास नहीं बल्कि इंसानियत, करुणा और मुहब्बत की मिसाल बन जाती हैं। ऐसी ही एक मार्मिक घटना उस समय की है जब Ali ibn Abi Talib पर हमला हुआ और उनकी तबीयत नाज़ुक हो गई।
यह घटना Laylat al‑Qadr से पहले की रातों में से एक, 19 रमज़ान की सुबह की है, जब कूफ़ा की मस्जिद में नमाज़ के दौरान Abd al‑Rahman ibn Muljam ने ज़हरीली तलवार से हमला कर दिया। यह खबर पूरे शहर में आग की तरह फैल गई कि इस्लाम के महान नेता और पैग़म्बर-ए-इस्लाम Muhammad के दामाद Ali ibn Abi Talib गंभीर रूप से घायल हो गए हैं।
जब यह खबर कूफ़ा के घर-घर पहुँची तो लोगों के दिलों में बेचैनी और ग़म की लहर दौड़ गई। विशेष रूप से बच्चों के दिलों में अपने प्रिय इमाम के लिए असीम मोहब्बत थी।
कहा जाता है कि जब हकीमों ने सलाह दी कि इमाम अली को दूध पिलाया जाए ताकि जख्म में ज़हर के असर का पता चल सके, तब शहर के बच्चों ने यह बात सुनी। फिर एक अद्भुत दृश्य देखने को मिला — कूफ़ा की गलियों से छोटे-छोटे बच्चे अपने हाथों में कटोरे और प्याले में दूध लेकर इमाम अली के घर की ओर दौड़ पड़े।
हर बच्चा यही चाहता था कि उसका लाया हुआ दूध इमाम अली को दिया जाए। यह दृश्य केवल एक बीमारी का नहीं बल्कि उस महान व्यक्तित्व के प्रति लोगों की गहरी श्रद्धा और प्रेम का प्रतीक था।
इतिहासकार लिखते हैं कि जब Hasan ibn Ali और Husayn ibn Ali ने बाहर आकर देखा तो दरवाजे पर बच्चों की भीड़ थी, जिनके हाथों में दूध के प्याले थे और आँखों में चिंता और प्रेम।
इस घटना से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्चा नेता वही होता है जो लोगों के दिलों में बसता है। Ali ibn Abi Talib ने अपने जीवन में न्याय, करुणा और इंसाफ की ऐसी मिसाल कायम की कि बच्चे तक उनसे गहरा लगाव रखते थे।
यह वाक़या हमें यह भी सिखाता है कि प्रेम, सेवा और इंसानियत ही किसी महान व्यक्तित्व की असली पहचान होती है। इमाम अली का जीवन और उनके प्रति लोगों की यह मोहब्बत आज भी पूरी दुनिया के लिए एक प्रेरणा है।

