सुप्रीम कोर्ट में कुछ दिन पहले हुई जूता फेंकने की घटना निश्चित रूप से निंदनीय है, पर यह भी सच है कि ऐसी घटनाएँ केवल आवेश का परिणाम नहीं होतीं, बल्कि समाज में पनपते असंतोष की एक झलक भी होती हैं। इस संदर्भ में पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू की सलाह गौर करने योग्य है। उन्होंने कहा है कि “न्यायाधीश अदालत में कम बोलें, क्योंकि बहुत बोलने वाला न्यायाधीश बेसुरा बाजा बन जाता है।”
काटजू की यह बात सतही व्यंग्य नहीं बल्कि गहरी सीख है। अदालतें तभी अपनी गरिमा बनाए रख सकती हैं जब वहाँ वाणी से अधिक विवेक का मूल्य हो। न्याय का अर्थ केवल फैसला सुनाना नहीं, बल्कि सुनने की क्षमता भी है।
⚖️ न्याय की जगह संवाद का मंच न बने अदालतें
अदालत वह स्थान है जहाँ तर्क और प्रमाण के आधार पर निर्णय तय होता है, न कि भाषणों या प्रतिक्रियाओं से। मगर हाल के वर्षों में कुछ अदालतों में ऐसी प्रवृत्ति दिखी है, जहाँ न्यायाधीश अक्सर सामाजिक या राजनीतिक टिप्पणियाँ करने लगते हैं। यह प्रवृत्ति न केवल न्याय की गंभीरता को हल्का करती है, बल्कि उस तटस्थता को भी कमज़ोर करती है, जो न्यायपालिका की आत्मा मानी जाती है।
👩⚖️ न्याय केवल किया नहीं, दिखना भी चाहिए
वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि कभी-कभी न्यायालय में उन्हें भेदभावपूर्ण व्यवहार का अनुभव होता है। जब अनुभवी वकील तक यह महसूस करें, तो आम नागरिक की स्थिति का अनुमान लगाना कठिन नहीं। न्याय केवल निष्पक्ष होना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि वह सबके सामने निष्पक्ष दिखाई भी देना चाहिए। यही न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी विश्वसनीयता है।
⚖️ मुख्य न्यायाधीश का संतुलन सराहनीय
सुप्रीम कोर्ट की हालिया घटना में प्रधान न्यायाधीश गवई ने जो संयम दिखाया, वह न्यायिक संतुलन का उदाहरण है। उन्होंने उत्तेजना में आए बिना दोषी अधिवक्ता को चेतावनी देकर छोड़ने का निर्देश दिया। लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसी स्थिति उत्पन्न ही न हो, इसके लिए प्रयास नहीं किए जाने चाहिए? न्यायालय को यह भी देखना होगा कि उसकी टिप्पणियाँ या अभिव्यक्तियाँ समाज में विवाद का कारण न बनें।
🕊️ न्याय की ताकत उसकी शालीनता में है
जस्टिस काटजू की नसीहत को अदालतों की आत्म-समीक्षा की पुकार कहा जा सकता है। अदालतों का आदर्श स्वरूप वही है, जहाँ गंभीरता, शालीनता और संयम तीनों साथ दिखाई दें। न्याय की सच्ची शक्ति उसकी भाषा की कोमलता और निर्णय की दृढ़ता में होती है, न कि तीखे शब्दों में। आज जब न्यायपालिका पर जनता की निगाह पहले से अधिक है, तब यह और भी ज़रूरी है कि न्यायाधीश अपने शब्दों की मर्यादा समझें, क्योंकि अदालत में बोला गया हर वाक्य आदेश जितना प्रभावशाली होता है।
अंततः, न्याय की कुर्सी पर शासन वाणी का नहीं, विवेक का होना चाहिए।

