अखिलेश का ‘चवन्नी’ वाला तंज, जयन्त ने जोड़ा जाट सम्मान से; संगीत सोम बोले—‘एक आने का भी नहीं छोड़ेंगे’
लखनऊ। सालों पहले चलन से बाहर हो चुकी ‘चवन्नी’ भले ही आज बाजार में किसी काम की नहीं रही, लेकिन उत्तर प्रदेश की चुनावी सियासत में इन दिनों इसकी खासी कीमत नजर आ रही है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों के बीच चवन्नी, इकन्नी, अठन्नी और 16 आना जैसे पुराने सिक्कों के जरिए वार-पलटवार का दौर शुरू हो गया है।
सियासी बयानबाजी में पुराने जमाने के सिक्के लौट आए हैं और हर दल की कोशिश है कि चुनावी बाजार में उसका सिक्का चले और 16 आना वोट उसके खाते में आए।
अखिलेश का तंज, जयन्त का पलटवार
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पुराने सहयोगी और राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) अध्यक्ष जयन्त चौधरी पर निशाना साधते हुए ‘चवन्नी को रुपया’ बनाने वाला तंज कसा। अखिलेश के इस बयान ने यूपी की सियासत में नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया।
जयन्त चौधरी ने इस टिप्पणी को महज राजनीतिक तंज के रूप में लेने के बजाय इसे जाट समाज के सम्मान से जोड़ दिया। इसके बाद बयानबाजी का सिलसिला और तेज हो गया।
संगीत सोम ने बढ़ाया सियासी तापमान
भाजपा के पूर्व विधायक संगीत सोम भी इस जुबानी जंग में कूद पड़े। उन्होंने पलटवार करते हुए कहा कि जिन्हें अखिलेश यादव ने ‘चवन्नी’ कहा है, वही 2027 में उन्हें ‘एक आने (इकन्नी)’ का भी नहीं छोड़ेंगे।
संगीत सोम के इस बयान ने चवन्नी से शुरू हुई सियासी बहस को और दिलचस्प बना दिया है। अब राजनीतिक गलियारों में पुराने सिक्कों के नाम नए राजनीतिक अर्थों के साथ इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
सवाल सिर्फ सिक्के का नहीं, सियासी कीमत का है
यूपी की राजनीति में गठबंधन और सामाजिक समीकरण हमेशा से चुनावी गणित का अहम हिस्सा रहे हैं। ऐसे में ‘चवन्नी’ और ‘इकन्नी’ जैसे शब्द महज तंज नहीं, बल्कि नेताओं और उनके राजनीतिक प्रभाव की कीमत आंकने का सियासी तरीका बनते जा रहे हैं।
2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन बयानबाजी से साफ है कि राजनीतिक दलों ने अपनी जमीन मजबूत करने की तैयारी शुरू कर दी है। आने वाले महीनों में यह जुबानी जंग किन नए ‘सिक्कों’ तक पहुंचेगी, यह देखना दिलचस्प होगा।
क्योंकि चुनावी बाजार में सवाल यही है—किसका सिक्का चलेगा और किसे मिलेगा पूरा ‘16 आना’?
— टाइम्स ऑफ ताज
