मुख्यमंत्री के रोजगार दावों और डिप्टी सीएम के ‘ई-रिक्शा’ बयान के बीच उठे सवाल
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में युवाओं के रोजगार का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से रोजगार और नौकरियों को लेकर किए जाने वाले दावों के बीच उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक का हालिया बयान सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया है। पाठक ने लखनऊ में भारत टैक्सी सेवा के शुभारंभ कार्यक्रम में ड्राइवरों को अपना काम करने और स्वरोजगार के फायदे बताते हुए कहा था कि नौकरी के पीछे भागने के बजाय कुछ घंटे अपना वाहन चलाकर कमाई की जा सकती है।
उनके बयान का एक हिस्सा सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसमें वह कहते सुनाई दिए—“नौकरी के चक्कर में मत पड़ो, अपना चार घंटा चलाओ…” उन्होंने अपने समय के अनुसार काम करने, परिवार के साथ समय बिताने और स्वयं के काम से कमाई करने की बात कही। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक कार्यक्रम में बड़ी संख्या में ड्राइवर मौजूद थे और उनका संबोधन मुख्य रूप से स्वरोजगार को प्रोत्साहित करने के संदर्भ में था।
लेकिन सवाल सिर्फ एक बयान का नहीं है। सवाल उस बड़े वर्ग का है जो वर्षों से सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा है, प्रतियोगी परीक्षाएं दे रहा है और भर्ती प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार कर रहा है।
नौकरी चाहिए या स्वरोजगार?
भारत जैसे देश में रोजगार के कई रूप हैं। सरकारी नौकरी, निजी क्षेत्र की नौकरी, कारोबार, स्वरोजगार और गिग इकॉनमी—हर क्षेत्र की अपनी भूमिका है। ई-रिक्शा या टैक्सी चलाकर कमाई करना भी किसी व्यक्ति के लिए सम्मानजनक स्वरोजगार हो सकता है।
लेकिन एक ऐसे युवा के लिए जिसने वर्षों तक पढ़ाई की है, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की है और अपनी योग्यता के अनुरूप नौकरी की उम्मीद की है, उसका सवाल अलग है।
वह पूछ सकता है—अगर मैंने इंजीनियरिंग, स्नातक, परास्नातक या कोई पेशेवर डिग्री हासिल की है तो मेरी योग्यता के अनुरूप रोजगार के अवसर कहां हैं?
यही वह बिंदु है जहां रोजगार की बहस केवल ‘नौकरी बनाम ई-रिक्शा’ तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
सरकारी भर्ती भी जरूरी, स्वरोजगार भी
सरकार के लिए एक तरफ सरकारी विभागों में आवश्यक रिक्तियों पर भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी और समयबद्ध रखना महत्वपूर्ण है, तो दूसरी तरफ निजी निवेश, उद्योग, स्टार्टअप और स्वरोजगार के अवसर बढ़ाना भी रोजगार नीति का हिस्सा हो सकता है।
ई-रिक्शा या टैक्सी चलाना किसी व्यक्ति के लिए तत्काल आय का माध्यम बन सकता है, लेकिन इससे यह सवाल खत्म नहीं होता कि उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं के लिए उनके कौशल और योग्यता के अनुरूप रोजगार के अवसर कितने बढ़े हैं।
इसी तरह केवल सरकारी नौकरी को ही रोजगार का एकमात्र विकल्प मानना भी रोजगार की पूरी तस्वीर नहीं है। बदलती अर्थव्यवस्था में स्वरोजगार और उद्यमिता की भूमिका लगातार बढ़ रही है।
युवाओं का असली सवाल
उत्तर प्रदेश का युवा शायद यह नहीं पूछ रहा कि नौकरी या ई-रिक्शा में कौन सही है।
उसका सवाल इससे बड़ा है—
क्या उसे अपनी योग्यता के अनुसार नौकरी का अवसर मिलेगा?
क्या सरकारी भर्तियां समय पर पूरी होंगी?
क्या निजी क्षेत्र में पर्याप्त रोजगार पैदा होंगे?
क्या स्वरोजगार शुरू करने वाले युवाओं को पूंजी, प्रशिक्षण और बाजार उपलब्ध कराया जाएगा?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या सरकार रोजगार के आंकड़ों और भर्ती प्रक्रिया की स्थिति को पारदर्शी तरीके से जनता के सामने रखेगी?
राजनीतिक बयानों से रोजगार का मुद्दा सुर्खियों में जरूर आ सकता है, लेकिन युवाओं के लिए असली महत्व अवसरों का है। नौकरी हो या स्वरोजगार—युवा ऐसा काम चाहता है जिससे उसकी शिक्षा, मेहनत और क्षमता का उपयोग हो तथा उसे सम्मानजनक और स्थिर आय का रास्ता मिले।
इसलिए रोजगार की बहस को ‘नौकरी बनाम ई-रिक्शा’ से आगे ले जाकर ‘योग्यता के अनुरूप अवसर बनाम बेरोजगारी’ के सवाल पर केंद्रित करने की जरूरत है।
— अज़हर उमरी, वरिष्ठ पत्रकार
Times of Taj Disclaimer: यह लेख उपलब्ध सार्वजनिक बयानों और रिपोर्टों के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें व्यक्त विश्लेषण का उद्देश्य रोजगार से जुड़े विभिन्न पक्षों को सामने रखना है।
