10 सीटों के लिए आज से नामांकन, 16 अक्टूबर को मतदान; विधायकों के रुख और गठबंधन की रणनीति पर टिकी नजरें
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों के लिए चुनावी प्रक्रिया मंगलवार, 29 सितंबर से शुरू हो गई। नामांकन की अंतिम तारीख 6 अक्टूबर है, जबकि 16 अक्टूबर को मतदान और उसी दिन मतगणना होगी। मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त हो रहा है।
इन 10 सीटों में फिलहाल आठ भारतीय जनता पार्टी, एक समाजवादी पार्टी और एक बहुजन समाज पार्टी के पास है। इनमें नौ सीटों पर नियमित कार्यकाल पूरा होने के कारण चुनाव हो रहा है, जबकि डॉ. दिनेश शर्मा के इस्तीफे से एक सीट पहले ही रिक्त हो चुकी है।
विधानसभा में मौजूदा संख्या बल को देखते हुए राज्यसभा चुनाव का मुख्य मुकाबला अतिरिक्त सीट को लेकर दिखाई दे रहा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार एक राज्यसभा सीट के लिए करीब 37 प्रथम वरीयता मतों की जरूरत होगी। इसी गणित के चलते भाजपा के लिए आठवीं सीट और सपा के लिए अतिरिक्त सीट हासिल करने की रणनीति महत्वपूर्ण हो जाती है।
2024 का घटनाक्रम फिर चर्चा में
राज्यसभा चुनाव का मौजूदा गणित दो वर्ष पहले हुए चुनाव की याद भी दिला रहा है। उस समय सपा के कई विधायकों ने क्रॉस-वोटिंग की थी और पल्लवी पटेल ने भी भाजपा प्रत्याशी संजय सेठ के पक्ष में मतदान किया था। इस घटनाक्रम का असर सपा के तत्कालीन राजनीतिक समीकरणों पर पड़ा था।
अब सवाल यह है कि 2026 के राज्यसभा चुनाव में क्या पिछले घटनाक्रम की पुनरावृत्ति होती है या पार्टियां अपने विधायकों को एकजुट रखने में सफल रहती हैं। उम्मीदवारों के नाम सामने आने और नामांकन के बाद वास्तविक तस्वीर और स्पष्ट होगी।
सपा के सामने अतिरिक्त सीट का सवाल
सपा के पास मौजूदा विधानसभा संख्या के आधार पर अपनी राज्यसभा सीट बचाने के साथ अतिरिक्त सीट के लिए भी दावा पेश करने का विकल्प है। हालांकि अतिरिक्त उम्मीदवार उतारने का फैसला केवल संख्या बल का मामला नहीं होगा। इसमें सहयोगी दलों, निर्दलीय विधायकों और संभावित क्रॉस-वोटिंग की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
दूसरी ओर भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन के सामने भी अपनी मौजूदा सीटों को बनाए रखने के साथ अतिरिक्त सीट के लिए रणनीति बनाने की चुनौती है। यही वजह है कि नामांकन शुरू होते ही राजनीतिक गतिविधियां तेज होने की संभावना है।
राज्यसभा चुनाव से 2027 की तस्वीर पढ़ने की कोशिश
राज्यसभा चुनाव को 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से जोड़कर भी देखा जा रहा है। पिछले कुछ समय से सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ओर से विधायकों के पाला बदलने को लेकर दावे किए जाते रहे हैं। ऐसे में मतदान के दौरान विधायकों का रुख पार्टियों के आंतरिक अनुशासन और राजनीतिक रणनीति की एक झलक दे सकता है।
हालांकि राज्यसभा का चुनाव विधानसभा चुनाव से अलग प्रक्रिया और अलग राजनीतिक समीकरणों पर आधारित होता है। इसलिए राज्यसभा में मतदान के आधार पर 2027 के विधानसभा चुनाव का सीधा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
सपा-कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे की चुनौती
दूसरी ओर सपा और कांग्रेस के बीच 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सीट बंटवारे का सवाल भी महत्वपूर्ण है। दोनों दल गठबंधन की बात करते रहे हैं, लेकिन प्रदेश स्तर के नेताओं के अलग-अलग बयानों से समय-समय पर सीटों और राजनीतिक प्रभाव को लेकर मतभेद सामने आते रहे हैं।
अखिलेश यादव के रायबरेली दौरे के बाद कांग्रेस की ओर से आई प्रतिक्रिया और उसके बाद शिवपाल यादव के बयान ने एक बार फिर दोनों दलों के बीच संभावित सीट बंटवारे और चुनावी रणनीति को चर्चा में ला दिया।
कांग्रेस नेताओं की ओर से उत्तर प्रदेश में अपने संगठन को मजबूत करने की कोशिशें जारी हैं, वहीं सपा भी अपने पीडीए अभियान के जरिए प्रदेश में राजनीतिक आधार मजबूत करने में जुटी है।
राज्यसभा चुनाव इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण होगा कि दोनों दल एक-दूसरे के साथ किस स्तर का राजनीतिक तालमेल दिखाते हैं। फिलहाल गठबंधन को लेकर सार्वजनिक रूप से अलग-अलग बयान सामने आ रहे हैं, जबकि अंतिम तस्वीर सीट बंटवारे और विधानसभा चुनाव की रणनीति तय होने के बाद ही साफ होगी।
अब निगाहें 6 अक्टूबर तक दाखिल होने वाले नामांकनों पर हैं। उम्मीदवारों की अंतिम सूची सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि मुकाबला कितनी सीटों तक सीमित रहता है और किन सीटों पर वास्तविक जोर-आजमाइश होती है।
