चरणों में गिरकर भरत ने मांगी राम की वापसी, चौदह वर्ष की मर्यादा निभाने को प्रभु ने सौंपीं चरण पादुकाएं
“जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी॥”
भ्रातृ प्रेम, त्याग और समर्पण की लीला ने श्रद्धालुओं की आंखें कीं नम; जयंत प्रसंग का भी हुआ भावपूर्ण मंचन
आगरा। एक ओर आंखों में अश्रुधारा, हृदय में भ्राता के वियोग की पीड़ा और प्रभु श्रीराम को अयोध्या वापस ले जाने की व्याकुलता, तो दूसरी ओर पिता के वचन और रघुकुल की मर्यादा निभाने का अटूट संकल्प। चित्रकूट में भरत मिलाप का यह दृश्य रविवार को श्री रामलीला कमेटी द्वारा रामलीला मैदान में आयोजित श्री रामलीला महोत्सव में साकार हुआ तो श्रद्धालुओं की आंखें नम हो उठीं। भ्राता भरत के निश्छल प्रेम, त्याग और समर्पण के आगे पूरा वातावरण भावुक हो गया, लेकिन प्रभु श्रीराम अपने धर्म और कर्तव्य से विचलित नहीं हुए। अंततः भरत जी प्रभु की चरण पादुकाएं सिर पर धारण कर अयोध्या लौटे और उनके प्रतिनिधि के रूप में राज्य संचालन का संकल्प लिया। भ्रातृ प्रेम, त्याग और मर्यादा का यह अनुपम प्रसंग दर्शकों के हृदय को भक्ति भाव से भर गया।

प्रभु श्रीराम, भ्राता लक्ष्मण और मां जानकी के चित्रकूट पहुंचने के बाद सुमंत जी अयोध्या लौटकर महाराज दशरथ को वनवास का पूरा समाचार सुनाते हैं। पुत्र वियोग में व्याकुल महाराज दशरथ कुछ समय पश्चात अपने प्राण त्याग देते हैं। उधर ननिहाल में भ्राता भरत को पिता के देहावसान का समाचार मिलता है। अयोध्या लौटने पर जब उन्हें माता कैकेयी के वरदानों के कारण प्रभु श्रीराम के वनवास और महाराज दशरथ के निधन की पूरी जानकारी मिलती है, तो वह अत्यंत दुखी और क्रोधित होकर माता कैकेयी को धिक्कारते हैं।
इसके बाद भरत जी राजपाट का त्याग कर प्रभु श्रीराम को अयोध्या वापस लाने के लिए चित्रकूट पहुंचते हैं। यहां चारों भाइयों का मिलन रामलीला का अत्यंत भावुक प्रसंग बन जाता है। भरत जी प्रभु श्रीराम के चरणों में गिरकर उनसे अयोध्या लौटने की बार-बार प्रार्थना करते हैं। वह कहते हैं कि अयोध्या का सिंहासन उन्हीं का है और उनके बिना राजमहल, नगर तथा प्रजा सभी सूने हैं। भरत जी का प्रेम, विनम्रता और समर्पण देखकर दर्शक भावविभोर हो उठते हैं।

भरत की विनती के आगे भी नहीं डिगी श्रीराम की प्रतिज्ञा
भरत जी के बार-बार आग्रह करने पर भी प्रभु श्रीराम पिता के वचन और रघुकुल की मर्यादा का पालन करते हुए चौदह वर्ष का वनवास पूरा करने का संकल्प नहीं छोड़ते। इसी दौरान महाराज जनक भी चित्रकूट पहुंचकर प्रभु श्रीराम से भेंट करते हैं और उन्हें अयोध्या लौटने के लिए समझाते हैं, लेकिन श्रीराम अपने धर्म और कर्तव्य पर अडिग रहते हैं।
अंततः प्रभु श्रीराम अपनी चरण पादुकाएं भरत जी को सौंपते हैं और उन्हें अयोध्या का राज्यकार्य संभालने की आज्ञा देते हैं। भरत जी चरण पादुकाओं को सिर पर धारण कर अयोध्या लौटने का संकल्प लेते हैं। वह स्वयं राजा के रूप में नहीं, बल्कि प्रभु श्रीराम के प्रतिनिधि के रूप में राज्य की सेवा करने का प्रण करते हैं। यह प्रसंग त्याग, निष्ठा और आदर्श भ्रातृ प्रेम की ऐसी मिसाल प्रस्तुत करता है, जिसमें सत्ता से बढ़कर सेवा और अधिकार से बढ़कर कर्तव्य को महत्व दिया गया।
मां जानकी को कष्ट पहुंचाने पर श्रीराम ने दिया जयंत को दंड
इसके पश्चात जयंत प्रसंग का मंचन हुआ। देवराज इंद्र के पुत्र जयंत कौए का रूप धारण कर मां जानकी के समीप पहुंचते हैं और उनके चरणों में चोंच मारकर उन्हें पीड़ा पहुंचाते हैं। मां जानकी को कष्ट में देखकर प्रभु श्रीराम क्रोधित हो उठते हैं और जयंत को दंड देने के लिए एक बाण छोड़ते हैं। श्रीराम के बाण से बचने के लिए जयंत तीनों लोकों में भटकता है, लेकिन कहीं शरण नहीं मिलती। अंततः वह प्रभु श्रीराम की शरण में लौटता है। प्रभु श्रीराम उसे दंडस्वरूप एक नेत्र से वंचित कर देते हैं। इस प्रसंग के माध्यम से प्रभु की शक्ति, न्याय और शरणागत के प्रति करुणा का संदेश दिया गया।

इन्होंने उतारी स्वरूपों की आरती
इस अवसर पर रामलीला कमेटी के महामंत्री राजीव अग्रवाल, ताराचंद अग्रवाल, मुकेश जौहरी, राकेश जैन, रमांशु शर्मा, महेश चंद्र अग्रवाल, गिरधर शरण अग्रवाल, विकास अग्रवाल, शैलेश अग्रवाल, अनुज अग्रवाल, अजय गर्ग, राजीव गुप्ता आदि ने प्रभु श्रीराम, माता जानकी एवं अन्य स्वरूपों की आरती उतारी। श्रद्धालुओं ने जय श्रीराम के जयघोष के साथ प्रभु के दर्शन कर पुण्य लाभ प्राप्त किया।

रामलीला में आज
कमेटी के मीडिया प्रभारी राहुल गौतम ने बताया कि सोमवार, 12 अक्टूबर को शूर्पणखा के नाक-कान काटने तथा खर-दूषण वध की लीला का मंचन किया जाएगा।
