सौरव गांगुली के ऐतिहासिक लॉर्ड्स सेलिब्रेशन से प्रेरित फिल्म, क्रिकेट की जीत से जोड़ती है एक लड़की के आत्मसम्मान और आजादी की कहानी
रेटिंग: ★★★½ (3.5/5)
निर्देशक: अभिनय देव
प्रमुख कलाकार: प्लाबिता बोरठाकुर, अंकुर विकल, समीधा गुरु, त्विशा जोशी और कृष्णा गोकानी
संगीत: राम संपत
अवधि: 78 मिनट
नई दिल्ली। भारतीय क्रिकेट के इतिहास में वर्ष 2002 का लॉर्ड्स सेलिब्रेशन आज भी प्रशंसकों के जेहन में ताजा है। नेटवेस्ट ट्रॉफी के फाइनल में इंग्लैंड को हराने के बाद तत्कालीन कप्तान सौरव गांगुली का टी-शर्ट उतारकर लहराना भारतीय क्रिकेट के आत्मविश्वास और आक्रामक अंदाज का प्रतीक बन गया था। निर्देशक अभिनय देव की फिल्म ‘दूसरा’ इसी ऐतिहासिक पल को एक लड़की की आजादी, आत्मसम्मान और सामाजिक बंदिशों से संघर्ष की कहानी से जोड़ती है।
‘दिल्ली बेली’ जैसी चर्चित फिल्म बना चुके अभिनय देव ने इस बार क्रिकेट के रोमांच से आगे बढ़कर महिला स्वतंत्रता और सामाजिक रूढ़ियों पर सवाल उठाने की कोशिश की है। फिल्म की खासियत यह है कि यह मैदान की जीत को निजी जिंदगी में बदलाव की प्रेरणा के रूप में पेश करती है।
कहानी: क्रिकेट की ऐतिहासिक जीत से मिली हिम्मत
फिल्म की कहानी राजस्थान के एक रूढ़िवादी परिवार में पली-बढ़ी तारा के इर्द-गिर्द घूमती है। तारा के सपने हैं और वह अपनी जिंदगी को अपने तरीके से जीना चाहती है, लेकिन परिवार और समाज की पुरानी मान्यताएं उसकी राह में बाधा बनती हैं।
इसी बीच भारतीय क्रिकेट टीम वर्ष 2002 में इंग्लैंड को हराकर नेटवेस्ट ट्रॉफी जीतती है। लॉर्ड्स की बालकनी में सौरव गांगुली का बेबाक जश्न तारा के भीतर भी आत्मविश्वास और बदलाव की चाह जगाता है। क्रिकेट के मैदान पर मिली जीत उसके लिए अपनी जिंदगी की लड़ाई लड़ने की प्रेरणा बन जाती है।
फिल्म क्रिकेट और एक लड़की के व्यक्तिगत संघर्ष के बीच भावनात्मक संबंध स्थापित करती है। इसका संदेश साफ है—कभी-कभी किसी दूसरे की जीत भी हमें अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने का साहस दे सकती है।
अभिनय देव का प्रयोगात्मक निर्देशन
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका विषय और उसे प्रस्तुत करने का तरीका है। अभिनय देव ने एक ऐतिहासिक खेल घटना को केवल क्रिकेट की यादों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसके जरिए सामाजिक बंधनों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मुद्दा उठाया है।
वास्तविक क्रिकेट फुटेज, पुरानी यादों और काल्पनिक कहानी का मेल फिल्म को अलग पहचान देता है। हालांकि, महज 78 मिनट की अवधि में तारा के संघर्ष और उसके भावनात्मक बदलाव को कुछ जगहों पर और विस्तार दिया जा सकता था। इसके बावजूद निर्देशक का विचार और प्रस्तुति सराहनीय है।
प्लाबिता बोरठाकुर ने निभाया दमदार किरदार
तारा की भूमिका में प्लाबिता बोरठाकुर का अभिनय फिल्म का प्रमुख आकर्षण है। उन्होंने एक ऐसी लड़की की बेचैनी, खामोशी और भीतर छिपी बगावत को प्रभावी ढंग से पर्दे पर उतारा है, जो अपने परिवार से प्यार करने के साथ अपनी स्वतंत्र पहचान भी चाहती है।
अंकुर विकल ने तारा के पिता की भूमिका में अच्छा प्रभाव छोड़ा है। उनका किरदार बेटी के प्रति स्नेह और पुरानी सामाजिक मान्यताओं के बीच उलझा दिखाई देता है। बाल कलाकार त्विशा जोशी अपनी मासूमियत से प्रभावित करती हैं। समीधा गुरु और कृष्णा गोकानी सहित अन्य कलाकारों ने भी अपने किरदारों के साथ न्याय किया है।
रिलीज से पहले सौरव गांगुली के मुकदमे से चर्चा में आई फिल्म
फिल्म ‘दूसरा’ रिलीज से पहले कानूनी विवाद के कारण सुर्खियों में रही। पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान सौरव गांगुली और उनकी अधिकृत बायोपिक से जुड़े निर्माण पक्ष ने फिल्म में उनकी पहचान, व्यक्तित्व और 2002 के लॉर्ड्स सेलिब्रेशन के व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया था।
22 अक्टूबर को दिल्ली हाई कोर्ट ने फिल्म की 23 अक्टूबर को प्रस्तावित सिनेमाघर रिलीज पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि, इससे विवाद का अंतिम निपटारा नहीं हुआ और कानूनी सवालों पर आगे सुनवाई होनी थी।
फिल्म निर्माताओं का पक्ष रहा कि ‘दूसरा’ सौरव गांगुली की बायोपिक नहीं, बल्कि एक लड़की की कहानी है, जिसे क्रिकेट के एक ऐतिहासिक क्षण से प्रेरणा मिलती है। इस कानूनी विवाद ने फिल्म की रिलीज से पहले दर्शकों की उत्सुकता बढ़ा दी।
संगीत और तकनीकी पक्ष
राम संपत का संगीत फिल्म के भावनात्मक माहौल को सहारा देता है। पुराने क्रिकेट फुटेज दर्शकों को भारतीय क्रिकेट के उस यादगार दौर में ले जाते हैं, जब टीम ने विदेशी धरती पर अपनी नई पहचान बनाई थी। क्रिकेट के दृश्यों और तारा की निजी जिंदगी के बीच संबंध स्थापित करने में एडिटिंग की अहम भूमिका है।
आखिर क्यों देखें ‘दूसरा’?
‘दूसरा’ उन फिल्मों में शामिल है, जो मनोरंजन के साथ सामाजिक संदेश देने की कोशिश करती हैं। प्लाबिता बोरठाकुर का प्रभावशाली अभिनय, अंकुर विकल की सशक्त भूमिका और अभिनय देव का अलग नजरिया इसे देखने लायक बनाते हैं।
हालांकि, पटकथा को कुछ हिस्सों में अधिक भावनात्मक गहराई दी जा सकती थी, लेकिन फिल्म का विषय और उसका संदेश इसकी कमियों को काफी हद तक संतुलित करते हैं।
अंतिम फैसला: ‘दूसरा’ क्रिकेट प्रेमियों और सामाजिक विषयों पर बनी फिल्में पसंद करने वाले दर्शकों के लिए एक दिलचस्प विकल्प है। फिल्म याद दिलाती है कि जीत सिर्फ मैदान पर ट्रॉफी हासिल करने का नाम नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने का साहस जुटाना भी है।
रेटिंग: 3.5/5 स्टार
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