बाल मनोचिकित्सक सना उमरी का विशेष लेख: बच्चों के व्यवहार को समझने, उनकी भावनाओं को सुनने और सही समय पर मार्गदर्शन देने की जरूरत
आगरा। बच्चों में बढ़ता गुस्सा, चिड़चिड़ापन, जिद और आक्रामक व्यवहार आज अभिभावकों और शिक्षकों के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। छोटी-छोटी बातों पर नाराज होना, दूसरे बच्चों से मारपीट करना, अपशब्दों का इस्तेमाल करना और अपनी बात मनवाने के लिए आक्रामक रवैया अपनाना जैसे व्यवहार कई परिवारों के सामने चुनौती बन रहे हैं।
आखिर कम उम्र में बच्चों के व्यवहार में इस तरह के बदलाव क्यों दिखाई दे रहे हैं? क्या इसके पीछे मोबाइल और सोशल मीडिया का बढ़ता इस्तेमाल है, परिवार का वातावरण है या पढ़ाई और प्रतिस्पर्धा का दबाव? इन सवालों पर एफ.एच. मेडिकल कॉलेज, एत्मादपुर, आगरा की चाइल्ड साइकियाट्रिस्ट सना उमरी ने अपने विशेष लेख में बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डाला है।
परिवार का माहौल बच्चों के व्यवहार को करता है प्रभावित
बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। बच्चे अपने माता-पिता और आसपास के लोगों के व्यवहार को देखकर बहुत कुछ सीखते हैं। घर में लगातार झगड़े, ऊंची आवाज में बातचीत, अपशब्दों का इस्तेमाल और गुस्से में प्रतिक्रिया देने का माहौल बच्चों के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है।
अभिभावक बच्चों को अनुशासन और अच्छे संस्कार सिखाना चाहते हैं, लेकिन इसके लिए स्वयं भी अपने व्यवहार में धैर्य और संयम रखना जरूरी है।
मोबाइल और डिजिटल सामग्री का बढ़ता प्रभाव
आज मोबाइल फोन बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। कम उम्र में बच्चे वीडियो गेम, सोशल मीडिया और विभिन्न प्रकार की डिजिटल सामग्री देखते हैं। इनमें मौजूद हिंसक दृश्य और आक्रामक व्यवहार कुछ बच्चों की सोच और व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।
लगातार स्क्रीन पर समय बिताने से बच्चों की नींद, शारीरिक गतिविधियों और पारिवारिक संवाद पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए अभिभावकों को बच्चों के स्क्रीन टाइम और उनके द्वारा देखी जाने वाली सामग्री पर ध्यान देना चाहिए।
पढ़ाई और प्रतिस्पर्धा का दबाव भी बन सकता है वजह
आज बच्चों से कम उम्र में ही बेहतर प्रदर्शन की अपेक्षा की जाती है। अच्छे अंक लाने, प्रतियोगिताओं में आगे रहने और दूसरे बच्चों से बेहतर बनने का दबाव उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।
दूसरे बच्चों से तुलना करना और बार-बार असफलता पर डांटना बच्चे के आत्मविश्वास को कमजोर कर सकता है। कई बार बच्चा अपनी भावनाओं और परेशानियों को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाता और उसका असर गुस्से तथा चिड़चिड़ेपन के रूप में सामने आता है।
बच्चों की बात सुनना भी जरूरी
बच्चों का हर गुस्सा बदतमीजी या अनुशासनहीनता नहीं होता। कई बार इसके पीछे अकेलापन, असुरक्षा, भावनात्मक परेशानी या अपनी बात न सुने जाने की भावना हो सकती है।
अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों के साथ समय बिताएं, उनकी बात ध्यान से सुनें और उनकी भावनाओं को समझने का प्रयास करें। बच्चों को डांटकर चुप कराने के बजाय बातचीत के माध्यम से उनकी समस्या जानना अधिक उपयोगी हो सकता है।
स्कूलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण
बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास में स्कूलों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। शिक्षा के साथ-साथ बच्चों को सहनशीलता, सहयोग, अनुशासन, आपसी सम्मान और विवादों को बातचीत से सुलझाने की सीख देना जरूरी है।
शिक्षकों को बच्चों के व्यवहार में अचानक बदलाव, लगातार गुस्सा, मारपीट या सामाजिक गतिविधियों से दूरी जैसे संकेतों पर ध्यान देना चाहिए। जरूरत पड़ने पर अभिभावकों को विशेषज्ञ की सलाह लेने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
बच्चों के व्यवहार में सुधार के लिए अभिभावक क्या करें?
- बच्चों के साथ प्रतिदिन पर्याप्त समय बिताएं।
- मोबाइल और स्क्रीन टाइम की उम्र के अनुसार सीमा निर्धारित करें।
- बच्चों को खेलकूद और रचनात्मक गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करें।
- बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों से न करें।
- उनकी भावनाओं और परेशानियों को गंभीरता से सुनें।
- गलती होने पर अपमानित करने के बजाय प्यार से समझाएं।
- पर्याप्त नींद और नियमित दिनचर्या सुनिश्चित करें।
- लगातार आक्रामक व्यवहार दिखाई देने पर बाल मनोचिकित्सक से परामर्श लें।
बच्चों का बचपन बचाना हम सबकी जिम्मेदारी
बच्चों को केवल अच्छे अंक और सफल करियर देना ही पर्याप्त नहीं है। उन्हें संवेदनशील, जिम्मेदार, सहनशील और दूसरों की भावनाओं का सम्मान करने वाला इंसान बनाना भी उतना ही जरूरी है।
बच्चों को महंगे मोबाइल और सुविधाएं देने के साथ उन्हें माता-पिता का समय, प्यार, संवाद और सुरक्षित वातावरण देना भी आवश्यक है।
बच्चों का गुस्सा केवल उनकी समस्या नहीं हो सकता, कई बार यह उनके आसपास के वातावरण और उनकी अनकही भावनाओं का संकेत भी होता है। इसलिए बच्चों को बदलने से पहले उनके मन को समझना जरूरी है।
लेखिका: सना उमरी
चाइल्ड साइकियाट्रिस्ट (बाल मनोचिकित्सक)
एफ.एच. मेडिकल कॉलेज, एत्मादपुर, आगरा।
प्रस्तुति: TIMES OF TAJ
डिस्क्लेमर: यह एक विशेषज्ञ-लेख के रूप में प्रस्तुत सामान्य जानकारी है। प्रत्येक बच्चे का व्यवहार और परिस्थिति अलग हो सकती है। व्यक्तिगत समस्या के लिए योग्य विशेषज्ञ से परामर्श लें।
