जुमा सिर्फ नमाज़ का दिन नहीं, बल्कि इबादत, भाईचारे, एकता, इंसानियत और आत्ममंथन का भी खास अवसर है
इस्लाम में जुमा यानी शुक्रवार के दिन को विशेष महत्व और फज़ीलत हासिल है। सप्ताह के सात दिनों में जुमा को एक खास मुकाम दिया गया है। यह दिन मुसलमानों के लिए केवल एक धार्मिक रस्म या नमाज़ अदा करने का अवसर नहीं, बल्कि अल्लाह की रहमत पाने, अपने गुनाहों की माफी मांगने, इबादत करने और अपनी जिंदगी का जायजा लेने का भी महत्वपूर्ण दिन है।
जुमा हमें याद दिलाता है कि दुनिया की भागदौड़, कारोबार और तमाम व्यस्तताओं के बीच इंसान को अपने रब को नहीं भूलना चाहिए। जिंदगी की असली कामयाबी केवल धन-दौलत और दुनियावी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि नेक अमल, अच्छे किरदार और अल्लाह की रज़ा हासिल करने में है।
कुरआन में जुमा की नमाज़ का विशेष आदेश
कुरआन शरीफ की सूरह अल-जुमा में अल्लाह तआला फरमाता है:
“ऐ ईमान वालो! जब जुमा के दिन नमाज़ के लिए अज़ान दी जाए तो अल्लाह के ज़िक्र की तरफ बढ़ो और खरीद-फरोख्त छोड़ दो। यह तुम्हारे लिए बेहतर है, अगर तुम जानते हो।”
(सूरह अल-जुमा, आयत 9)
इस आयत से स्पष्ट होता है कि जुमा की नमाज़ मुसलमानों के लिए कितनी अहमियत रखती है। यह दिन हमें दुनियावी व्यस्तताओं से कुछ समय निकालकर अल्लाह की इबादत और उसकी याद में लगाने की शिक्षा देता है।
जुमा मुसलमानों की एकता और भाईचारे का प्रतीक
जुमा की नमाज़ का सबसे खूबसूरत पहलू यह है कि इस दिन अमीर-गरीब, छोटे-बड़े और समाज के विभिन्न वर्गों के लोग एक ही मस्जिद में एक ही सफ में खड़े होते हैं। यहां न किसी की दौलत का फर्क होता है और न किसी के पद और प्रतिष्ठा का।
सभी लोग एक ही अल्लाह के सामने सिर झुकाते हैं। यह दृश्य इस्लाम की समानता, भाईचारे और इंसानी बराबरी की शिक्षा को वास्तविक रूप देता है।
जुमा हमें सिखाता है कि इंसान की असली पहचान उसका चरित्र, उसका तकवा और उसके नेक काम हैं, न कि उसकी दौलत, जाति या सामाजिक हैसियत।
पाकीज़गी और साफ-सफाई का संदेश
जुमा के दिन गुस्ल करना, साफ-सुथरे कपड़े पहनना, खुशबू लगाना, मस्जिद में समय से पहुंचना और खुत्बा ध्यानपूर्वक सुनना सुन्नत और मुस्तहब आदाब में शामिल हैं।
इस दिन सूरह अल-कहफ की तिलावत, नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद ﷺ पर अधिक से अधिक दरूद शरीफ भेजने, दुआ और इस्तिगफार करने का भी विशेष महत्व है।
इस्लाम केवल बाहरी सफाई की शिक्षा नहीं देता, बल्कि दिल और विचारों को भी नफरत, ईर्ष्या, घमंड और बुराइयों से पाक रखने का संदेश देता है।
खुत्बा-ए-जुमा समाज सुधार का माध्यम
जुमा का खुत्बा मुसलमानों की धार्मिक और नैतिक शिक्षा का महत्वपूर्ण जरिया है। इसके माध्यम से कुरआन और हदीस की रोशनी में समाज को सही दिशा देने का प्रयास किया जाता है।
खुत्बे में माता-पिता के अधिकार, पड़ोसियों के साथ अच्छा व्यवहार, गरीबों की मदद, सच्चाई, ईमानदारी, शिक्षा, इंसाफ और इंसानियत जैसे विषयों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
यदि मुसलमान खुत्बे में दी गई नसीहतों को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में उतार लें तो समाज में सकारात्मक बदलाव आ सकता है।
जुमा में दुआ की खास घड़ी
हदीस शरीफ में जुमा के दिन एक ऐसी खास घड़ी का जिक्र मिलता है जिसमें बंदा अल्लाह से जो जायज़ दुआ मांगता है, अल्लाह उसे अता फरमाता है।
इसलिए इस मुबारक दिन में अधिक से अधिक दुआ, दरूद शरीफ, जिक्र और इस्तिगफार करना चाहिए। अपने माता-पिता, परिवार, बीमारों, परेशानहाल लोगों, जरूरतमंदों और पूरी इंसानियत के लिए भी दुआ करनी चाहिए।
इबादत के साथ इंसानी अधिकारों की भी अहमियत
जुमा की अहमियत केवल मस्जिद में नमाज़ अदा करने तक सीमित नहीं है। यह दिन हमें अपने व्यवहार और सामाजिक जिम्मेदारियों का जायजा लेने का भी संदेश देता है।
हमें सोचना चाहिए कि क्या हम अपने माता-पिता के अधिकार अदा कर रहे हैं? क्या हम अपने पड़ोसियों का ख्याल रखते हैं? क्या हमारे कारोबार और व्यवहार में ईमानदारी है? क्या हम किसी का हक तो नहीं मार रहे? क्या हम जरूरतमंदों की मदद करते हैं?
इस्लाम में अल्लाह के हुकूक के साथ बंदों के हुकूक की अदायगी पर भी विशेष जोर दिया गया है। नमाज़ पढ़ने के साथ झूठ, धोखा, नाइंसाफी, चुगली, गीबत और दूसरों के अधिकारों का हनन करने से बचना भी जरूरी है।
नई पीढ़ी को जुमा की अहमियत समझाना जरूरी
आज की युवा पीढ़ी आधुनिक तकनीक, सोशल मीडिया और दुनियावी व्यस्तताओं में उलझी हुई है। ऐसे समय में माता-पिता, शिक्षक और समाज के जिम्मेदार लोगों की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों और युवाओं को जुमा की अहमियत और इस्लाम की नैतिक शिक्षाओं से परिचित कराएं।
उन्हें केवल नमाज़ पढ़ने की हिदायत देना ही काफी नहीं, बल्कि नमाज़ का अर्थ, उसका उद्देश्य, अच्छे व्यवहार, इंसानियत और दूसरों के सम्मान की शिक्षा देना भी जरूरी है।
निष्कर्ष: जुमा का असली पैगाम जिंदगी में उतारें
जुमा का दिन हमें हर सप्ताह यह अवसर देता है कि हम अपने कर्मों का आत्ममंथन करें, अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी मांगें, दिलों से नफरत और ईर्ष्या को दूर करें तथा इंसानियत की सेवा का संकल्प लें।
जरूरत इस बात की है कि हम जुमा को केवल सप्ताह में एक बार अदा की जाने वाली नमाज़ तक सीमित न रखें, बल्कि इसके संदेश को अपने पूरे जीवन का हिस्सा बनाएं।
यदि हम जुमा की नमाज़ के बाद मस्जिद से निकलकर भी सच्चाई, ईमानदारी, मोहब्बत, इंसाफ, भाईचारे और इंसानियत के रास्ते पर चलें, तो यही इस मुबारक दिन की शिक्षाओं का वास्तविक उद्देश्य है।
अल्लाह तआला हम सभी को जुमा की फज़ीलत समझने, इसके आदाब पर अमल करने और कुरआन व सुन्नत की रोशनी में जिंदगी गुजारने की तौफीक अता फरमाए। आमीन।
लेखक: अज़हर उमरी, वरिष्ठ पत्रकार
