लेखक: अज़हर उमरी (वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विशेषज्ञ)
भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचारधारा बन जाते हैं। डॉ. राम मनोहर लोहिया ऐसा ही एक नाम है—एक ऐसा चिंतक, जिसने सत्ता के सामने झुकने के बजाय सच को अपनी आवाज़ बनाया और समाज के अंतिम व्यक्ति के लिए संघर्ष को अपना जीवन उद्देश्य।
डॉ. राम मनोहर लोहिया का जन्म 23 मार्च 1910 को हुआ था। यह संयोग ही है कि जिस दिन देश भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत को याद करता है, उसी दिन लोहिया का जन्मदिन भी हमें यह याद दिलाता है कि क्रांति केवल बंदूक से नहीं, विचारों से भी होती है।
लोहिया का जीवन संघर्षों की एक ऐसी कहानी है, जिसमें न सत्ता का लालच था, न पद की भूख। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की, लेकिन जब उन्हें लगा कि कांग्रेस अपने मूल आदर्शों से भटक रही है, तो उन्होंने अलग राह चुनने में देर नहीं की। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी—सत्ता से समझौता नहीं, सिद्धांतों से समझौता नहीं।
उनका समाजवाद पश्चिमी किताबों का उधार नहीं था, बल्कि भारतीय समाज की जमीनी हकीकत से निकला हुआ था। उन्होंने ‘सप्त क्रांति’ का विचार दिया—एक ऐसी क्रांति, जो केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और मानसिक गुलामी से मुक्ति की बात करती थी। वे जाति व्यवस्था, लैंगिक भेदभाव और आर्थिक असमानता के सबसे मुखर आलोचक थे।
डॉ. राम मनोहर लोहिया का मानना था कि “जिंदा कौमें पाँच साल तक इंतजार नहीं करतीं।” यह वाक्य आज भी भारतीय राजनीति के लिए आईना है। लोकतंत्र में जनता की सक्रिय भागीदारी और सरकार से जवाबदेही की मांग—यही उनकी राजनीति का मूल मंत्र था।
आज जब राजनीति अक्सर व्यक्तिवाद और प्रचार तक सीमित हो जाती है, तब लोहिया का विचार हमें यह याद दिलाता है कि असली राजनीति जनता के बीच, उनके संघर्षों के साथ खड़े होने में है। उन्होंने हमेशा गरीब, किसान, मजदूर और वंचित वर्ग की आवाज़ को बुलंद किया।
उनकी राजनीति में एक और खास बात थी—सरलता और स्पष्टता। वे जटिल बातों को भी आम आदमी की भाषा में कहते थे। यही कारण है कि उनका प्रभाव केवल संसद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गांव-गांव तक फैला।
आज के दौर में जब सामाजिक न्याय, समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं, तब डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। वे हमें सिखाते हैं कि बदलाव केवल चुनाव जीतने से नहीं, बल्कि समाज को बदलने से आता है।
डॉ. लोहिया का जीवन हमें यह संदेश देता है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो एक व्यक्ति भी व्यवस्था को चुनौती दे सकता है। वे केवल एक नेता नहीं थे, बल्कि एक आंदोलन थे—एक ऐसा आंदोलन, जो आज भी जारी है।
आज जरूरत है कि हम लोहिया को केवल याद न करें, बल्कि उन्हें समझें, उनके विचारों को अपनाएं और एक न्यायपूर्ण समाज के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ें।

