लेखक – अज़हर उमरी
इस्लामी साल का पहला महीना मुहर्रमुल हराम चार सम्मानित महीनों में से एक है, जिनका उल्लेख अल्लाह तआला ने कुरआन में किया है:
“निश्चय ही अल्लाह के निकट महीनों की संख्या बारह है… उनमें से चार सम्मानित (हराम) महीने हैं।”
(सूरह अत-तौबा: 36)
मुहर्रम की पहली तारीख केवल नए हिजरी वर्ष का आरंभ नहीं, बल्कि हमें उस महान कुर्बानी की याद भी दिलाती है जिसने इंसानियत, न्याय और सत्य की रक्षा के लिए इतिहास में अमिट छाप छोड़ी। यही वह महीना है जिसमें कर्बला का दर्दनाक लेकिन प्रेरणादायक अध्याय सामने आया।
हिजरत से कर्बला तक
जब हज़रत मुहम्मद ﷺ ने मक्का से मदीना हिजरत फरमाई, तो इस्लामी इतिहास का एक नया दौर शुरू हुआ। इसी हिजरत की याद में हिजरी कैलेंडर की शुरुआत की गई।
रसूलुल्लाह ﷺ के नवासे, जन्नत के युवाओं के सरदार Imam Husayn ibn Ali ने अपने नाना के दीन की हिफाज़त के लिए वह मिसाल कायम की, जिसकी चमक आज भी दुनिया को राह दिखाती है।
सफ़र-ए-कर्बला की शुरुआत
जब यज़ीद ने अपनी बैअत लेने का दबाव बनाया, तो इमाम हुसैन (अ.स.) ने अन्याय और अत्याचार के सामने झुकने से इंकार कर दिया। आपने फरमाया कि उनका उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि उम्मत की इस्लाह और अपने नाना रसूलुल्लाह ﷺ की उम्मत को सही राह दिखाना है।
मदीना से मक्का और फिर मक्का से इराक़ की ओर रवाना होते हुए इमाम हुसैन (अ.स.) ने सत्य और न्याय का संदेश दिया। रास्ते में अनेक लोगों ने आपको खतरे से आगाह किया, लेकिन आपने हक़ के रास्ते को नहीं छोड़ा।
मैदान-ए-कर्बला
2 मुहर्रम 61 हिजरी को इमाम हुसैन (अ.स.) अपने परिवार और साथियों के साथ कर्बला पहुंचे। यहीं से वह परीक्षा शुरू हुई जिसने इतिहास को बदल दिया।
7 मुहर्रम को फ़ुरात का पानी बंद कर दिया गया। मासूम बच्चे, महिलाएं और साथी प्यास की शिद्दत झेलते रहे, लेकिन इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके साथियों ने सब्र और इस्तिकामत का दामन नहीं छोड़ा।
यौमे आशूरा
10 मुहर्रम, जिसे आशूरा कहा जाता है, इस्लामी इतिहास का सबसे दर्दनाक दिन है। इस दिन इमाम हुसैन (अ.स.) के 72 वफ़ादार साथियों ने एक-एक करके शहादत पाई। अंततः इमाम हुसैन (अ.स.) ने भी अल्लाह की राह में अपनी जान कुर्बान कर दी।
यह केवल एक युद्ध नहीं था, बल्कि सत्य और असत्य, न्याय और अत्याचार, ईमान और सत्ता के घमंड के बीच संघर्ष था।
कर्बला का पैगाम
कर्बला हमें सिखाती है कि:
- सत्य के लिए डटे रहना ही असली सफलता है।
- अत्याचार के सामने झुकना मोमिन की शान नहीं।
- धर्म और इंसानियत की रक्षा के लिए हर कुर्बानी छोटी है।
- सब्र, त्याग और ईमानदारी जीवन की सबसे बड़ी पूंजी हैं।
मुहर्रम की पहली तारीख पर हमारा संकल्प
मुहर्रम की पहली तारीख हमें आत्ममंथन, तौबा, इबादत और कर्बला के संदेश को अपनाने का अवसर देती है। हमें चाहिए कि हम इमाम हुसैन (अ.स.) की कुर्बानी को केवल एक ऐतिहासिक घटना न समझें, बल्कि उसे अपने जीवन का मार्गदर्शक बनाएं।
इमाम हुसैन (अ.स.) ने हमें सिखाया कि सिर कटाया जा सकता है, लेकिन सत्य और न्याय के सामने सिर झुकाया नहीं जा सकता।
सलाम हो कर्बला के शहीदों पर, सलाम हो इमाम हुसैन (अ.स.) पर, जिनकी कुर्बानी क़यामत तक इंसानियत को राह दिखाती रहेगी।
“हर दिन आशूरा है और हर ज़मीन कर्बला है।”

