आज दुनिया जिन हालात से गुज़र रही है, विशेषकर फ़िलिस्तीन और ग़ज़ा की त्रासदी ने पूरी मानवता के सामने कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं। ऐसे समय में एक वाक्य अक्सर सुनने को मिलता है— “यहूदी आज भी उसी तरह हैं जिस तरह क़ुरआन में कहा गया है, मगर मुसलमान उस तरह नहीं हुए जिस तरह क़ुरआन ने बताया।”
यह कथन यदि आत्ममंथन के लिए कहा जाए तो इसमें विचार की गुंजाइश है, लेकिन इसे किसी पूरे समुदाय के प्रति घृणा का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। स्वयं क़ुरआन हमें न्याय और संतुलन की शिक्षा देता है।
क़ुरआन में कुछ यहूदी समुदायों के ऐसे व्यवहार का उल्लेख है जिन्होंने अल्लाह से किए गए वादों को तोड़ा, सत्य को छिपाया, नबियों का विरोध किया और धार्मिक आदेशों में मनमानी की। उदाहरण के लिए, सूरह अल-बक़रह (2:75, 2:79) और सूरह अल-माइदह (5:13) में ऐसे लोगों का उल्लेख मिलता है जिन्होंने ईश्वरीय मार्गदर्शन के साथ बेईमानी की।
लेकिन उसी क़ुरआन में यह भी कहा गया है:
“वे सब एक जैसे नहीं हैं। अहले-किताब में एक ऐसा समूह भी है जो रातों को अल्लाह की आयतें पढ़ता है, सज्दा करता है, भलाई का आदेश देता है और बुराई से रोकता है।”
(सूरह आले-इमरान 3:113–114)
यानी क़ुरआन स्वयं यह स्पष्ट कर देता है कि किसी पूरे समुदाय के बारे में एक जैसा निर्णय देना उचित नहीं है।
अब यदि मुसलमानों की बात करें तो क़ुरआन ने उन्हें बहुत ऊँचा दर्जा और बड़ी जिम्मेदारी दी है। अल्लाह तआला फ़रमाता है:
“तुम सबसे उत्तम उम्मत हो, जिसे लोगों के लिए निकाला गया है। तुम भलाई का आदेश देते हो, बुराई से रोकते हो और अल्लाह पर ईमान रखते हो।”
(सूरह आले-इमरान 3:110)
एक अन्य स्थान पर फ़रमाया:
“और इसी प्रकार हमने तुम्हें एक संतुलित (मध्यम) उम्मत बनाया है, ताकि तुम लोगों पर गवाह बनो।”
(सूरह अल-बक़रह 2:143)
इस्लाम केवल इबादत का नाम नहीं, बल्कि चरित्र, न्याय, ईमानदारी, दया, अमानतदारी और इंसाफ़ का भी नाम है। क़ुरआन कहता है:
“अल्लाह न्याय, सदाचार और संबंधियों को देने का आदेश देता है।”
(सूरह अन-नहल 16:90)
और यह भी:
“किसी क़ौम की दुश्मनी तुम्हें न्याय छोड़ने पर न उकसाए। न्याय करो, यही तक़वा के अधिक निकट है।”
(सूरह अल-माइदह 5:8)
पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने भी मुसलमान की पहचान बताते हुए फ़रमाया:
“मुसलमान वह है जिसकी ज़बान और हाथ से दूसरे मुसलमान सुरक्षित रहें।”
(सहीह अल-बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)
एक अन्य हदीस में है:
“तुममें सबसे श्रेष्ठ वह है जिसका चरित्र सबसे उत्तम हो।”
(सहीह अल-बुख़ारी)
यदि आज हम अपने समाज का ईमानदारी से मूल्यांकन करें, तो पाएँगे कि हमारी सबसे बड़ी कमी क़ुरआन से दूरी नहीं, बल्कि उसकी शिक्षाओं पर अमल की कमी है। हमने तिलावत को तो अपनाया, लेकिन न्याय, अनुशासन, ज्ञान, ईमानदारी, एकता और सेवा-भाव को अपने जीवन में उतारने में कमी की।
आज आवश्यकता दूसरों की आलोचना से अधिक अपने सुधार की है। यदि मुसलमान वास्तव में क़ुरआन के बताए हुए आदर्शों—सच्चाई, न्याय, शिक्षा, मेहनत, एकता, दया और अल्लाह की आज्ञाकारिता—को अपना लें, तो वे फिर से दुनिया के लिए रहमत, इंसाफ़ और नैतिक नेतृत्व का उदाहरण बन सकते हैं।
क़ुरआन का संदेश स्पष्ट है—दूसरों का हिसाब अल्लाह करेगा, लेकिन अपने कर्मों का हिसाब हमें स्वयं देना होगा। इसलिए एक सच्चे मोमिन का रास्ता दूसरों की कमियाँ गिनाना नहीं, बल्कि स्वयं को क़ुरआन और सुन्नत के अनुसार ढालना है। यही सफलता का मार्ग है और यही उम्मत की वास्तविक शक्ति भी।
लेखक। अज़हर उमरी
वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक चिंतक

