मोबाइल की स्क्रीन से मैदान तक लौटने का समय
29 अगस्त केवल एक तारीख नहीं है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि खेल सिर्फ पदक जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि मजबूत शरीर, अनुशासन, आत्मविश्वास और बेहतर समाज बनाने की बुनियाद हैं। हर वर्ष 29 अगस्त को भारत में राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है। यह दिन महान हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है, जिन्होंने अपनी हॉकी की कला से भारत को दुनिया में पहचान दिलाई।
लेकिन आज सवाल यह है कि क्या हमने खेल को वास्तव में अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाया है?
📱 मैदान छोटे होते गए, मोबाइल की स्क्रीन बड़ी
एक समय था जब शाम होते ही मोहल्लों में बच्चों की आवाजें सुनाई देती थीं। कोई क्रिकेट खेलता था, कोई फुटबॉल, कोई हॉकी, तो कोई कबड्डी। गलियों और मैदानों में दौड़ते बच्चों के चेहरे पर थकान नहीं, जीतने का जुनून दिखाई देता था।
आज तस्वीर बदल रही है। बच्चे मैदान में कम और मोबाइल की स्क्रीन पर ज्यादा नजर आते हैं। घंटों ऑनलाइन गेम, सोशल मीडिया और वीडियो देखने में गुजर जाते हैं।
राष्ट्रीय खेल दिवस हमें इसी बदलती तस्वीर पर सोचने का मौका देता है।
🏑 ध्यानचंद ने सिखाया—प्रतिभा से बड़ी होती है मेहनत
मेजर ध्यानचंद का जीवन बताता है कि सफलता केवल प्रतिभा से नहीं मिलती। उसके पीछे अनुशासन, अभ्यास, धैर्य और लगातार मेहनत होती है।
आज भारत के पास क्रिकेट, हॉकी, कुश्ती, बैडमिंटन, एथलेटिक्स, मुक्केबाजी और कई अन्य खेलों में शानदार प्रतिभाएं हैं। भारतीय खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का गौरव बढ़ाया है।
लेकिन हर चैंपियन की शुरुआत किसी बड़े स्टेडियम से नहीं होती। किसी छोटे मैदान में खेलने वाला बच्चा भी भविष्य का खिलाड़ी बन सकता है—जरूरत सिर्फ उसे मौका, मार्गदर्शन और प्रोत्साहन देने की है।
🎓 पढ़ाई और खेल में से किसी एक को चुनना जरूरी नहीं
हमारे समाज में अक्सर बच्चों से कहा जाता है—“पहले पढ़ाई करो, खेल से क्या मिलेगा?”
यह सोच बदलने की जरूरत है।
खेल और पढ़ाई एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। खेल बच्चों को समय प्रबंधन, टीमवर्क, नेतृत्व, अनुशासन और हार के बाद दोबारा उठ खड़े होने की कला सिखाते हैं।
जो बच्चा मैदान में हारना सीखता है, वह जिंदगी की मुश्किलों से लड़ना भी सीखता है।
🏅 हर बच्चा खिलाड़ी बने, हर खिलाड़ी को सम्मान मिले
खेल दिवस का उद्देश्य सिर्फ बड़े खिलाड़ियों को याद करना नहीं होना चाहिए। हमें अपने आसपास के उन बच्चों को भी पहचानना होगा जिनमें प्रतिभा है, लेकिन संसाधनों की कमी है।
किसी बच्चे के पास महंगा बैट नहीं है तो इसका मतलब यह नहीं कि उसमें क्रिकेटर बनने की क्षमता नहीं है। किसी के पास अच्छे जूते नहीं हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि वह धावक नहीं बन सकता।
प्रतिभा अक्सर वहीं छिपी होती है, जहां सुविधाएं सबसे कम होती हैं।
जरूरत है स्कूलों में खेल के मैदान बचाने की, स्थानीय स्तर पर प्रतियोगिताएं बढ़ाने की और प्रतिभाशाली बच्चों को बेहतर प्रशिक्षण उपलब्ध कराने की।
🇮🇳 खेल सिर्फ पदक नहीं, देश का चरित्र भी बनाते हैं
खेल हमें सिखाता है कि जीत अकेले नहीं मिलती। उसके पीछे कोच, परिवार, साथी खिलाड़ी और वर्षों की मेहनत होती है।
खेल हमें यह भी सिखाता है कि सामने वाला प्रतिद्वंद्वी है, दुश्मन नहीं। हार के बाद खिलाड़ी हाथ मिलाता है और अगले मुकाबले की तैयारी करता है।
यही भावना समाज और देश को भी मजबूत बनाती है।
❤️ आज एक संकल्प लेने की जरूरत है
राष्ट्रीय खेल दिवस पर सिर्फ सोशल मीडिया पर खिलाड़ियों की तस्वीरें लगाने से बदलाव नहीं आएगा।
बदलाव तब आएगा जब माता-पिता बच्चों को मैदान तक पहुंचाएंगे, स्कूल खेल को पढ़ाई जितनी गंभीरता देंगे, सरकार और समाज खेल सुविधाओं को बढ़ाएंगे और हम अपने स्थानीय खिलाड़ियों की मेहनत को भी सम्मान देंगे।
आज किसी बच्चे से यह मत पूछिए कि वह कौन सा मेडल जीतेगा।
बस उससे इतना पूछिए—
“बेटा, आज मैदान में खेलने चलोगे?”
शायद इसी एक सवाल से किसी भविष्य के चैंपियन की कहानी शुरू हो जाए।
राष्ट्रीय खेल दिवस का असली संदेश यही है—
मैदान बचाइए, बच्चों का बचपन बचाइए और भारत के भविष्य को मजबूत बनाइए।
क्योंकि जिस देश के बच्चे मैदान में दौड़ते हैं, वही देश दुनिया की दौड़ में आगे निकलता है।
अज़हर उमरी
वरिष्ठ पत्रकार
