डॉo रैहान अख़्तर
सहायक प्रोफ़ेसर, धर्म संकाय अध्ययन
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़
Email: raihanhams6@gmail.com
वर्तमान समय का मुस्लिम युवा सूचनाओं की ऐसी बाढ़ में जीवन व्यतीत कर रहा है, जहाँ सत्य और असत्य, तर्क और भावनाओं तथा ज्ञान और अफ़वाह के बीच अंतर करना पहले की अपेक्षा कहीं अधिक कठिन हो गया है। विश्व की घटनाएँ, सामाजिक अन्याय, धार्मिक मतभेद और डिजिटल संसार की अनगिनत आवाज़ें उसके मन में निरंतर प्रश्न उत्पन्न करती रहती हैं। ऐसे वातावरण में आवश्यकता केवल निषेधों की सूची प्रस्तुत करने की नहीं, बल्कि ऐसी संतुलित धार्मिक अंतर्दृष्टि विकसित करने की है, जो ईमान को अक़्ल, भावनाओं को नैतिकता और मतभेद को न्याय के साथ जोड़ सके। क़ुरआन, हदीस और सीरत-ए-नबवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इसी बौद्धिक संतुलन के मूल मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
इस्लामी शिक्षाओं को समझने के लिए सबसे पहले मानव जीवन के संबंध में उसके दृष्टिकोण को सामने रखना आवश्यक है। ऐसे समय में, जब मनुष्य का मूल्य कभी धर्म, जाति, नस्ल या राजनीतिक संबद्धता के आधार पर निर्धारित होने लगता है, क़ुरआन मानव जीवन को एक उच्च नैतिक स्थान प्रदान करता है। ईश्वर का फ़रमान है: “जिसने किसी प्राण की हत्या किसी प्राण के बदले या धरती में उपद्रव फैलाने के अतिरिक्त की, तो मानो उसने समस्त मनुष्यों की हत्या कर दी; और जिसने एक प्राण को बचाया, तो मानो उसने समस्त मनुष्यों को बचा लिया।” (अल-माइदा, 5:32)। इमाम क़ुर्तुबी रहिमहुल्लाह ने इस आयत के अंतर्गत मानव जीवन की पवित्रता को शरीअत के महान उद्देश्यों में शामिल किया है और स्पष्ट किया है कि मानव जीवन की रक्षा धार्मिक दायित्व भी है। (तफ़्सीर अल-क़ुर्तुबी, सूरह अल-माइदा, आयत 32)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सीरत(जीवनी)इस सिद्धांत को व्यावहारिक रूप प्रदान करती है। एक ग़ज़वे के दौरान एक महिला मृत पाई गई तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उसके मारे जाने को नापसंद किया और महिलाओं तथा बच्चों की हत्या से मना फ़रमाया। (सहीह बुख़ारी, हदीस 3014)। इससे ज्ञात होता है कि युद्ध भी नैतिक सीमाओं से मुक्त नहीं है; शत्रुता किसी मनुष्य को उसके मूल अधिकार से वंचित करने का सामान्य औचित्य नहीं बन सकती। यही कारण है कि इस्लामी न्याय की अवधारणा में उद्देश्य के साथ साधन भी महत्वपूर्ण है। आज जब संसार के विभिन्न क्षेत्रों की मानवीय त्रासदियाँ युवाओं तक सीधे पहुँचती हैं, तो अत्याचार के प्रति क्रोध स्वाभाविक है, लेकिन इस्लाम इस क्रोध को अनियंत्रित प्रतिक्रिया के बजाय न्याय और नैतिकता के अधीन रखना चाहता है। इस प्रकार करुणा केवल एक भावना बनकर नहीं रह जाती, बल्कि एक नैतिक सिद्धांत का रूप धारण कर लेती है।
मानव जीवन की पवित्रता के बाद एक और मूल प्रश्न यह है कि धार्मिक आदेशों और घटनाओं को समझा कैसे जाए? कई बार समस्या धर्म की शिक्षा में नहीं, बल्कि उसके अध्ययन की पद्धति में होती है। एक आयत (श्लोक)को अलग करके देख लिया जाता है, एक हदीस का आधा अर्थ प्रस्तुत कर दिया जाता है और फिर उसी के आधार पर पूरे धर्म की धारणा बना ली जाती है। क़ुरआन इस प्रवृत्ति के बजाय जाँच-पड़ताल का सिद्धांत प्रस्तुत करता है। क़ुरआन में फ़रमाया गया है: “हे ईमान वालो! यदि कोई अवज्ञाकारी तुम्हारे पास कोई समाचार लेकर आए, तो उसकी अच्छी तरह जाँच कर लिया करो, कहीं ऐसा न हो कि तुम अज्ञानता में किसी समुदाय को हानि पहुँचा बैठो और फिर अपने किए पर पछताओ।” (अल-हुजुरात, 49:6)। इमाम इब्न आशूर रहिमहुल्लाह के निकट समाचार की जाँच सामाजिक जीवन की स्थिरता के लिए मूलभूत महत्व रखती है; अप्रमाणित सूचना के आधार पर किया गया निर्णय सामूहिक क्षति का कारण बन सकता है। (अत-तहरीर वत-तनवीर, सूरह अल-हुजुरात, आयत 6)
इसी सिद्धांत की पुष्टि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इस कथन से होती है। आपने फ़रमाया: “मनुष्य के झूठा होने के लिए इतना ही काफ़ी है कि वह हर सुनी-सुनाई बात को बयान करता फिरे।” (सहीह मुस्लिम, हदीस 5)। आज यह शिक्षा केवल नैतिक उपदेश बनकर नहीं रह गई है। एक छोटी-सी क्लिप में आधी हदीस, एक तस्वीर में आधी आयत या किसी ऐतिहासिक घटना का भावनात्मक अंश पूरे धार्मिक दृष्टिकोण का प्रतिनिधि बनने लगता है। इसलिए युवा को केवल सही और ग़लत बताना पर्याप्त नहीं है, उसे सही बात तक पहुँचने की ज्ञानपरक पद्धति भी सिखानी होगी। यही चेतना उसे भावनात्मक धार्मिक सामग्री का मात्र उपभोक्ता बनने से बचाकर गंभीर विद्यार्थी बनाती है।
इसी ज्ञानपरक सावधानी की आवश्यकता जिहाद और क़िताल (सशस्त्र संघर्ष) के प्रश्न में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। आधुनिक विमर्श में ये दोनों शब्द प्रायः समान अर्थों में प्रयुक्त होते हैं, जबकि इस्लामी ज्ञान-परंपरा में इनके अर्थ समान नहीं हैं। जिहाद का अर्थ व्यापक है और इसमें संघर्ष तथा प्रयास के विभिन्न रूप सम्मिलित हैं, जबकि क़िताल सशस्त्र संघर्ष की विशिष्ट परिस्थितियों से संबंधित है। इस अंतर की उपेक्षा करने से एक व्यापक धार्मिक अवधारणा केवल युद्ध के अर्थ तक सीमित होकर रह जाती है। युद्ध के संबंध में क़ुरआन का एक स्पष्ट सिद्धांत है। ईश्वर का फ़रमान है: “और यदि वे संधि की ओर झुकें तो तुम भी उसकी ओर झुक जाओ और अल्लाह पर भरोसा रखो।” (अल-अनफ़ाल, 8:61)। इमाम इब्न कसीर रहिमहुल्लाह इस आयत के अंतर्गत संधि की ओर झुकाव को, हित की स्थिति में, स्वीकार करने का मार्गदर्शन बताते हैं। (तफ़्सीर इब्न कसीर, सूरह अल-अनफ़ाल, आयत 61)। सुल्ह-ए-हुदैबिया इस सिद्धांत का व्यावहारिक उदाहरण है। उस समय कुछ सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम के लिए संधि की शर्तों को स्वीकार करना आसान नहीं था, लेकिन रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तत्काल भावनाओं के बजाय भविष्य की संभावनाओं को सामने रखा और यही समझौता बाद में इस्लाम के प्रसार का महत्वपूर्ण माध्यम बना। युद्ध के मैदान में भी महिलाओं और बच्चों की हत्या से निषेध यह स्पष्ट करता है कि क़िताल असीमित हिंसा का नाम नहीं है। आज जब “जिहाद” जैसी संज्ञाएँ ज्ञानपरक चर्चा से अधिक सोशल मीडिया के राजनीतिक और भावनात्मक विमर्श में सुनाई देती हैं, तो युवाओं के लिए आवश्यक है कि वे शब्द से प्रभावित होने के बजाय उसके शरीअती अर्थ, उसकी शर्तों और उसकी नैतिक सीमाओं को समझने का प्रयास करें।
धार्मिक समझ की यही आवश्यकता हमें मतभेद के प्रश्न तक ले जाती है। मतभेद इस्लामी ज्ञान-परंपरा का कोई अपरिचित तत्व नहीं है; फ़िक़्ह और तफ़्सीर का इतिहास अनेक मतों का साक्षी रहा है। वास्तविक समस्या मतभेद नहीं, बल्कि उसके नैतिक शिष्टाचार का समाप्त हो जाना है। जब ज्ञानपरक मतभेद किसी व्यक्ति या समूह के ईमान और धार्मिक स्थिति पर निर्णय सुनाने का माध्यम बन जाए, तो स्थिति गंभीर हो जाती है। क़ुरआन मुसलमानों को सचेत करता है। फ़रमाया गया है: “और तुम सब मिलकर अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से थाम लो और आपस में विभाजित न हो।” (आल-ए-इमरान, 3:103)। इमाम तबरी रहिमहुल्लाह के निकट इस आयत में मुसलमानों को अल्लाह के मार्गदर्शन से सामूहिक रूप से जुड़े रहने और पारस्परिक एकता की ओर उन्मुख किया गया है। (जामिउल बयान, सूरह आल-ए-इमरान, आयत 103) सीरत-ए-नबवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम में हज़रत उसामा बिन ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु की घटना इस संबंध में असाधारण मार्गदर्शन प्रदान करती है। एक व्यक्ति ने “हुरक़ा” के अभियान के दौरान कलिमा पढ़ा, लेकिन हज़रत उसामा रज़ियल्लाहु अन्हु ने उसे मार दिया। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनसे पूछा कि जब उसने कलिमा पढ़ लिया था तो तुमने उसे क्यों मार दिया? हज़रत उसामा रज़ियल्लाहु अन्हु ने उसके कथन को प्राण बचाने की एक युक्ति बताया, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उसके अंतर्मन के बारे में निर्णय करने से मना फ़रमाया। (सहीह मुस्लिम, हदीस 277)। इस घटना में एक व्यापक नैतिक सिद्धांत निहित है कि मनुष्य के अंतर्मन का अंतिम निर्णय मनुष्य के अधिकार में नहीं है। आज सोशल मीडिया पर कुछ वाक्यों के आधार पर लोगों को ईमान और कुफ़्र के खानों में बाँटने की प्रवृत्ति इसी कारण चिंताजनक है कि यह ज्ञानपरक मतभेद को नैतिक शत्रुता में बदल देती है। इसलिए युवाओं को मतभेद से भयभीत करने के बजाय मतभेद के शिष्टाचार सिखाना अधिक प्रभावी धार्मिक प्रशिक्षण है।
लेकिन वैचारिक दृढ़ता का प्रश्न केवल ग़लत विचारों के खंडन तक सीमित नहीं है। यह भी समझना होगा कि कोई युवा उग्रवादी विचारधारा की ओर आकर्षित क्यों होता है। कभी-कभी मानसिक रिक्तता, उद्देश्य की तलाश, पहचान का प्रश्न, सामाजिक वंचना या अन्याय की तीव्र अनुभूति उसे ऐसे विचारों के निकट ले जाती है, जो सरल और त्वरित उत्तर प्रदान करते हैं। क़ुरआन कहता है: “निश्चय ही अल्लाह किसी समुदाय की दशा को नहीं बदलता, जब तक वे स्वयं अपनी दशा को न बदलें।” (अर-रअद, 13:11)। इमाम सअदी रहिमहुल्लाह इस आयत के अंतर्गत स्पष्ट करते हैं कि परिवर्तन का आरंभ मनुष्य की अपनी परिस्थितियों, कर्मों और व्यवहारों के सुधार से होता है। (तफ़्सीर अस-सअदी, सूरह अर-रअद, आयत 11)
सीरत-ए-नबवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम में युवाओं के साथ व्यवहार इसका व्यावहारिक उत्तर प्रस्तुत करता है। उन्हें केवल उपदेश नहीं दिया गया, बल्कि उद्देश्य, विश्वास और ज़िम्मेदारी भी प्रदान की गई। हज़रत मुसअब बिन उमैर रज़ियल्लाहु अन्हु इसका प्रमुख उदाहरण हैं। एक सुखी युवा ने इस्लाम स्वीकार किया तो उसके जीवन की दिशा बदल गई और बाद में उन्होंने मदीना में इस्लाम की शिक्षा और दावत की ज़िम्मेदारी संभाली। आज यदि युवा को केवल “यह मत करो” और “इससे बचो” कहा जाता रहे, तो उसके भीतर का रिक्त स्थान बना रह सकता है। उसे ऐसा मार्ग भी चाहिए जिसमें उसकी क्षमताओं का उपयोग हो, उसकी बात सुनी जाए और उसे किसी सकारात्मक उद्देश्य का हिस्सा होने का अनुभव हो। ज्ञान, सेवा और रचनात्मक भूमिका में स्थान पाने वाला युवा विनाशकारी विचारधाराओं से अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित रहता है।
यहीं से धार्मिक मार्गदर्शन के वर्तमान साधनों का प्रश्न भी सामने आता है। युवा अब धार्मिक प्रश्न का उत्तर पाने के लिए अनिवार्य रूप से किसी विद्वान या पुस्तक की प्रतीक्षा नहीं करता, वह प्रश्न लिखता है, वीडियो देखता है और कुछ ही मिनटों में एक मत बना लेता है। इस परिवर्तन को केवल शिकायत के दृष्टिकोण से देखने के बजाय धार्मिक मार्गदर्शन की संप्रेषण-पद्धति पर भी विचार करना होगा। क़ुरआन का सिद्धांत है: “और जिस बात का तुम्हें ज्ञान नहीं, उसके पीछे न चलो; निश्चय ही कान, आँख और हृदय इन सबके बारे में पूछताछ की जाएगी।” (अल-इसरा, 17:36)। इमाम क़ुर्तुबी रहिमहुल्लाह ने इस आयत से बिना ज्ञान के किसी बात का अनुसरण करने से बचने का सामान्य सिद्धांत ग्रहण किया है। (तफ़्सीर अल-क़ुर्तुबी, सूरह अल-इसरा, आयत 36) इस सिद्धांत की रोशनी में समस्या सोशल मीडिया छोड़ने की नहीं, बल्कि उसका ज्ञानपरक चेतना के साथ उपयोग करने की है। विश्वसनीय विद्वान और अपरिचित वक्ता, मूल संदर्भ और गढ़ा हुआ उद्धरण, पूरा वक्तव्य और काट-छाँटकर प्रस्तुत की गई क्लिप के बीच अंतर करना अब धार्मिक शिक्षा का हिस्सा बन चुका है। यहाँ उलेमा और धार्मिक संस्थाओं की ज़िम्मेदारी भी बढ़ जाती है। यदि विश्वसनीय ज्ञानपरक आवाज़ युवा तक उसकी भाषा और उसके मंच पर नहीं पहुँचेगी, तो उत्पन्न होने वाले रिक्त स्थान को कोई न कोई अवश्य भर देगा।
डिजिटल युग युवा को केवल सूचनाएँ ही नहीं देता, बल्कि उसे संसार भर में दिखाई देने वाले अत्याचार के दृश्यों से भी सीधे जोड़ देता है। युद्ध, प्रवासन, भेदभाव और मानवीय पीड़ा के दृश्य उसके भीतर तीव्र भावनाएँ उत्पन्न करते हैं। ऐसे वातावरण में इस्लामी प्रशिक्षण की परीक्षा यह है कि पीड़ित के प्रति सहानुभूति और अत्याचार के विरुद्ध घृणा को नैतिक सीमाओं के भीतर किस प्रकार रखा जाए। क़ुरआन का आदेश है: “हे ईमान वालो! न्याय पर दृढ़ता से क़ायम रहो और अल्लाह के लिए गवाही दो, चाहे वह तुम्हारे अपने विरुद्ध ही क्यों न हो।” (अन-निसा, 4:135)। इमाम इब्न आशूर रहिमहुल्लाह इस आयत में न्याय की उस निष्पक्षता को प्रमुखता देते हैं, जिसमें मनुष्य अपने स्वार्थ और सामूहिक संबंधों से ऊपर उठकर सत्य को देखता है। (अत-तहरीर वत-तनवीर, सूरह अन-निसा, आयत 135)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भी वास्तविक शक्ति को भावनात्मक प्रभुत्व के बजाय नैतिक संयम से जोड़ा है। नबी का फ़रमान है: “शक्तिशाली वह नहीं जो लोगों को अपनी शक्ति से पछाड़ दे, बल्कि शक्तिशाली वह है जो क्रोध के समय स्वयं पर नियंत्रण रखे।” (सहीह बुख़ारी, किताबुल अदब)। इसलिए किसी अत्याचार पर क्रोध आए तो मूल प्रश्न केवल यह नहीं कि क्रोध कितना है, बल्कि यह है कि उसे किस दिशा में ले जाया जा रहा है। क्या सही जानकारी प्रसारित की जा रही है? क्या पीड़ित की क़ानूनी, मानवीय या नैतिक सहायता की जा रही है? क्या अत्याचार के विरुद्ध बिना घृणा फैलाए आवाज़ उठाई जा सकती है? इस्लामी पद्धति क्रोध को समाप्त नहीं करती; उसे न्याय के अधीन करती है।
यही न्याय और नैतिकता मुस्लिम युवा की नागरिकता की अवधारणा को भी स्पष्ट करते हैं। धार्मिक पहचान उसे समाज से अलग नहीं करती, बल्कि अपने आसपास के लोगों के अधिकारों, शांति और कल्याण के संबंध में उत्तरदायी बनाती है। ऐसे देश में जहाँ विभिन्न धर्म, भाषाएँ, संस्कृतियाँ और सभ्यतागत परंपराएँ साथ-साथ रहती हैं, यह शिक्षा विशेष महत्व रखती है। क़ुरआन में अल्लाह फ़रमाता है: “ऐ लोगो! हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें विभिन्न जातियों और क़बीलों में इसलिए बनाया कि तुम एक-दूसरे को पहचानो। निश्चय ही अल्लाह के निकट तुममें सबसे अधिक सम्मानित वह है जो सबसे अधिक तक़वा वाला है।” (अल-हुजुरात, 49:13)। इमाम इब्न कसीर रहिमहुल्लाह स्पष्ट करते हैं कि विभिन्न जातियों और क़बीलों का अस्तित्व पारस्परिक परिचय के लिए है, न कि गर्व और तिरस्कार के लिए। (तफ़्सीर इब्न कसीर, सूरह अल-हुजुरात, आयत 13) इसी प्रकार दूसरे स्थान पर अल्लाह फ़रमाता है: “अल्लाह तुम्हें उन लोगों के साथ भलाई और न्याय करने से नहीं रोकता, जिन्होंने धर्म के मामले में तुमसे युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाला।” (अल-मुम्तहिना, 60:8)। मदीना में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने विभिन्न समूहों के साथ समझौतों और सामूहिक ज़िम्मेदारियों की व्यवस्था स्थापित की, जो इस बात का व्यावहारिक उदाहरण थी कि धार्मिक पहचान और सामाजिक व्यवस्था एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। भारतीय मुस्लिम युवा के लिए इसका अर्थ यह है कि नागरिकता केवल कानूनी स्थिति नहीं, बल्कि नैतिक ज़िम्मेदारी भी है। शिक्षा, कानून का पालन, सामाजिक शांति, ज्ञान की सेवा, पड़ोसियों के अधिकार, मानवीय सम्मान और देश के निर्माण तथा विकास में भागीदारी उसके धार्मिक चरित्र के विरोध में नहीं है। अपनी पहचान पर विश्वास का अर्थ समाज से अलग होना नहीं, बल्कि उसे सकारात्मक भूमिका के रूप में प्रकट करना है।
इस बौद्धिक और नैतिक निर्माण में परिवार, उलेमा और शैक्षिक संस्थाओं की भूमिका मूलभूत है। युवा की पहली पाठशाला घर है; उसके बाद मित्र, शिक्षक, मस्जिद, पुस्तक और अब डिजिटल संसार भी उसके प्रशिक्षण का हिस्सा हैं। यदि वह प्रश्न करे और उसे केवल डाँट मिले, मदरसे में प्रश्न प्रस्तुत करे तो उसे गुस्ताख़(अविनयी) समझा जाए, या अपनी धार्मिक पहचान के साथ उलझन व्यक्त करे तो उसके भीतर बौद्धिक रिक्तता पैदा होना अस्वाभाविक नहीं है। क़ुरआन रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की प्रशिक्षण-पद्धति का वर्णन इस प्रकार करता है: “अल्लाह की दया ही से आप उनके लिए नरम रहे; और यदि आप कठोर स्वभाव और कठोर हृदय होते, तो वे आपके आसपास से बिखर जाते। अतः उन्हें क्षमा कर दीजिए, उनके लिए क्षमा माँगिए और मामलों में उनसे परामर्श कीजिए।” (आल-ए-इमरान, 3:159)। इमाम राज़ी रहिमहुल्लाह नरमी और परामर्श को लोगों को जोड़ने तथा सुधार के महत्वपूर्ण साधनों में गिनते हैं। (मफ़ातीहुल ग़ैब, सूरह आल-ए-इमरान, आयत 159)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत मुआज़ बिन जबल रज़ियल्लाहु अन्हु को यमन रवाना करते समय उनसे यह जानने के लिए बातचीत की कि नए मामलों में वे निर्णय कैसे करेंगे। इस संवाद में आदेश के साथ सोचने की पद्धति सिखाने का पहलू भी मौजूद था। (सुनन अबी दाऊद, किताबुल अक़ज़िया)। इससे ज्ञात होता है कि युवाओं को हर प्रश्न का तैयार उत्तर देने के साथ-साथ उन्हें सही ढंग से सोचना सिखाना भी आवश्यक है। माता-पिता उनके प्रश्न सुनें, उलेमा उनकी शंकाओं को समझें और शैक्षिक संस्थाएँ उन्हें तर्क और सम्मान के साथ मतभेद करना सिखाएँ। विश्वास का संबंध स्थापित हो जाए तो युवा अपनी उलझनों को छिपाने के बजाय उन्हें व्यक्त करता है, और यही मार्गदर्शन का पहला द्वार है।
वैचारिक दृढ़ता की पूर्णता केवल इस बात से नहीं होती कि युवा ग़लत विचारों को पहचान ले, बल्कि उसे यह भी मालूम होना चाहिए कि इस्लामी जीवन का निर्माण किन सकारात्मक सिद्धांतों पर होता है। यदि धार्मिक प्रशिक्षण का अधिकांश भाग केवल “यह मत करो” और “इससे बचो” तक सीमित रह जाए, तो इस्लाम उसके मन में एक रक्षात्मक अवधारणा बन सकता है। इसके विपरीत, इस्लाम की सकारात्मक अवधारणा उसे बताती है कि ईमान मनुष्य को क्या बनाता है और समाज उससे क्या अपेक्षा करता है। अल्लाह फ़रमाता है: “नेकी और बदी समान नहीं हो सकती; बुराई को उस तरीके से दूर करो जो सबसे अच्छा हो, फिर वह व्यक्ति जिसके और तुम्हारे बीच शत्रुता थी, मानो वह घनिष्ठ मित्र बन जाएगा।” (फ़ुस्सिलत, 41:34)। इमाम सअदी रहिमहुल्लाह इस आयत में सदाचार और उपकार की उस शक्ति को स्पष्ट करते हैं, जो शत्रुता के वातावरण को भी निकटता में बदल सकती है। (तफ़्सीर अस-सअदी, सूरह फ़ुस्सिलत, आयत 34)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ईमान को दूसरों के प्रति शुभचिंतन से जोड़ते हुए फ़रमाया: “तुममें से कोई व्यक्ति उस समय तक पूर्ण ईमान वाला नहीं हो सकता, जब तक वह अपने भाई के लिए भी वही पसंद न करे जो अपने लिए पसंद करता है।” (मुत्तफ़क़ अलैह)। सीरत-ए-नबवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का मदनी काल इसी सकारात्मक इस्लाम की व्यापक तस्वीर प्रस्तुत करता है: मस्जिद का निर्माण, मुआख़ात,(आपसी भाईचारा)शिक्षा, समझौते, न्याय, बाज़ार के व्यवहार और पड़ोसियों के अधिकार, ये सभी एक रचनात्मक सामाजिक जीवन के अंग थे। इस्लाम ने मनुष्य को केवल यह नहीं बताया कि किन मार्गों से बचना है, बल्कि यह भी सिखाया कि धरती पर भलाई किस प्रकार पैदा करनी है। आज के युवाओं को भी इसी इस्लाम की आवश्यकता है, ऐसा इस्लाम जो उनके प्रश्नों से घबराए नहीं, उनके क्रोध को न्याय की ओर ले जाए, उनकी क्षमताओं को व्यर्थ न जाने दे और उन्हें यह अनुभूति कराए कि वे अपने ज्ञान, चरित्र और सेवा के माध्यम से समाज में भलाई उत्पन्न कर सकते हैं।
अंततः मुस्लिम युवाओं के सामने उपस्थित बौद्धिक चुनौती का समाधान केवल कठोर निषेधों, भावनात्मक भाषणों या कुछ उग्रवादी विचारों के खंडन में नहीं है। वास्तविक आवश्यकता ऐसे धार्मिक प्रशिक्षण की है, जो युवाओं को इस्लाम के मूल, नैतिक और बौद्धिक सिद्धांतों से इस प्रकार जोड़ दे कि वे बदलती परिस्थितियों में सही और ग़लत के बीच अंतर कर सकें। क़ुरआन मानव जीवन की पवित्रता, समाचार की जाँच, मतभेद के बावजूद न्याय और बुराई का बेहतर ढंग से सामना करने की शिक्षा देता है, जबकि सीरत-ए-नबवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इन सिद्धांतों को हमारे सामने व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत करती है। इस समग्र पद्धति में ईमान के साथ अक़्ल, धार्मिक स्वाभिमान के साथ न्याय, मतभेद के साथ नैतिकता, युद्ध की परिस्थितियों में मानवीय सीमाएँ और धार्मिक पहचान के साथ सामाजिक ज़िम्मेदारी मौजूद है। इसी संतुलन से भारतीय मुस्लिम युवाओं में वह वैचारिक दृढ़ता पैदा हो सकती है, जो उन्हें केवल उग्रवादी विचारों से सुरक्षित न रखे, बल्कि उन्हें ज्ञानवान, चरित्रवान, ज़िम्मेदार और सकारात्मक नागरिक बनाए। ऐसा युवा अपने धर्म से जुड़े रहते हुए अपने समाज के लिए भलाई, शांति और विकास का माध्यम बन सकता है।
