नई दिल्ली। वैवाहिक बलात्कार यानी Marital Rape को लेकर देश में जारी कानूनी बहस अब सुप्रीम कोर्ट के सामने अहम चरण में पहुंच गई है। पत्नी की सहमति के बिना पति द्वारा यौन संबंध बनाए जाने को बलात्कार की श्रेणी में रखा जाए या नहीं, इस महत्वपूर्ण संवैधानिक और कानूनी सवाल पर सुप्रीम कोर्ट जल्द सुनवाई कर सकता है।
भारत में वर्तमान आपराधिक कानून के तहत 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र की पत्नी के साथ पति द्वारा जबरन यौन संबंध को सामान्यतः बलात्कार के अपराध के रूप में नहीं माना जाता। पुराने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 में पति को इस संबंध में अपवाद दिया गया था। नए आपराधिक कानून में भी वयस्क पति-पत्नी के बीच यौन संबंध को बलात्कार की कानूनी परिभाषा से बाहर रखने वाला प्रावधान मौजूद है।
मामले की सुनवाई की तारीख तय करने की मांग वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष उठाई। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं।
जयसिंह ने अदालत को बताया कि संबंधित याचिकाएं सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हैं, लेकिन केंद्र सरकार ने अभी तक इस मुद्दे पर अपना विस्तृत जवाब दाखिल नहीं किया है। उन्होंने नवंबर में मामले की सुनवाई के लिए तारीख तय किए जाने का अनुरोध किया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले को बुधवार को सूचीबद्ध किया गया है और केंद्र सरकार की ओर से एक प्रतिनिधि भी अदालत में मौजूद रहेगा। अदालत ने संकेत दिया कि केंद्र का पक्ष सुनने के बाद ही सुनवाई के लिए उपयुक्त तारीख तय की जाएगी।
एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने कहा कि ऐसी तारीख तय की जा सकती है जिससे सभी पक्षों को अपने तर्क तैयार करने और आवश्यक दस्तावेज दाखिल करने के लिए पर्याप्त समय मिल सके।
संविधान और महिला अधिकारों से जुड़ा सवाल
वैवाहिक बलात्कार का मुद्दा केवल आपराधिक कानून तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संविधान में समानता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा और निजता जैसे अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है।
इससे पहले कर्नाटक हाईकोर्ट के समक्ष भी एक मामले में यह सवाल उठा था कि पति को पत्नी के खिलाफ बलात्कार और अप्राकृतिक यौन संबंध के आरोपों में मिलने वाली कानूनी छूट संविधान के अनुच्छेद 14 में दिए गए समानता के अधिकार की कसौटी पर खरी उतरती है या नहीं।
केंद्र सरकार का अलग मत
केंद्र सरकार वैवाहिक बलात्कार को अलग आपराधिक अपराध बनाए जाने के पक्ष में नहीं है। सरकार का तर्क है कि वैवाहिक संबंधों में जबरन यौन संबंध को बलात्कार के अपराध के दायरे में लाने से वैवाहिक विवादों में आपराधिक कानून के कथित दुरुपयोग की संभावना बढ़ सकती है।
केंद्र का यह भी कहना है कि महिलाओं को घरेलू हिंसा और यौन शोषण से सुरक्षा देने के लिए देश में पहले से कई कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। इनमें घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 भी शामिल है।
अब सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह है कि वयस्क पत्नी की सहमति के बिना पति द्वारा बनाए गए यौन संबंध को बलात्कार की कानूनी परिभाषा से बाहर रखने वाला प्रावधान संविधान के अनुरूप है या नहीं। अदालत का फैसला भारत में विवाह, सहमति और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कानून पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।
