शिक्षा के नाम पर तकनीक का अंधाधुंध इस्तेमाल कहीं बच्चों के मानसिक विकास को तो नहीं रोक रहा?
लेखक: अज़हर उमरी
आज का दौर तकनीक का दौर है। मोबाइल, टैबलेट, कंप्यूटर और स्मार्ट क्लास ने शिक्षा के तरीके को काफी बदल दिया है। तकनीक का सही और संतुलित इस्तेमाल बच्चों की पढ़ाई को आसान और रोचक बना सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हम छोटे बच्चों को जरूरत से ज्यादा स्क्रीन के हवाले तो नहीं कर रहे हैं?
आज कई स्कूलों में छोटी कक्षाओं के बच्चों को पढ़ाई के नाम पर मोबाइल, टैबलेट और डिजिटल स्क्रीन से जोड़ दिया गया है। होमवर्क, वीडियो लेक्चर, ऑनलाइन असाइनमेंट और डिजिटल गतिविधियों के नाम पर बच्चे लंबे समय तक स्क्रीन के सामने बैठे रहते हैं। परिणाम यह है कि जिस उम्र में बच्चे मैदान में दौड़ते, दोस्तों के साथ खेलते, किताबों के पन्ने पलटते और प्रकृति को समझते हुए सीखते थे, उस उम्र में उनका बड़ा हिस्सा स्क्रीन पर बीतने लगा है।
शिक्षा का माध्यम बच्चों की आदत न बन जाए
तकनीक शिक्षा का माध्यम होनी चाहिए, शिक्षा का स्थानापन्न नहीं। यदि हर छोटी-बड़ी सीख के लिए बच्चे को मोबाइल की आवश्यकता पड़ने लगे तो धीरे-धीरे उसकी निर्भरता बढ़ सकती है।
छोटे बच्चे स्वाभाविक रूप से देखकर, सुनकर, बोलकर, छूकर और खेलकर सीखते हैं। उनके मानसिक विकास में बातचीत, कहानी सुनना, चित्र बनाना, खेलना, सवाल पूछना और दूसरे बच्चों के साथ मिलकर गतिविधियां करना बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यदि इन गतिविधियों की जगह लगातार स्क्रीन ले ले, तो बच्चों के सीखने का स्वाभाविक तरीका प्रभावित हो सकता है।
किताब से ज्यादा स्क्रीन क्यों?
यह सवाल स्कूलों, अभिभावकों और शिक्षा व्यवस्था—तीनों को खुद से पूछना चाहिए।
क्या पहली कक्षा के बच्चे को हर विषय के लिए मोबाइल की जरूरत है?
क्या हर होमवर्क डिजिटल होना जरूरी है?
क्या बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक और किताब पर्याप्त नहीं हैं?
तकनीक का इस्तेमाल वहां होना चाहिए जहां वह वास्तव में सीखने में मदद करे। लेकिन यदि तकनीक केवल इसलिए इस्तेमाल हो रही है क्योंकि वह आधुनिक दिखाई देती है, तो हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था पर पुनर्विचार करना चाहिए।
बच्चों का बचपन स्क्रीन में कैद न हो
बच्चे का बचपन केवल अंक, होमवर्क और ऑनलाइन असाइनमेंट का नाम नहीं है। बचपन में खेल का मैदान, मिट्टी की खुशबू, दोस्तों की शरारत, किताबों की दुनिया, परिवार से बातचीत और शिक्षक के साथ सीधा संवाद भी शिक्षा का हिस्सा हैं।
एक बच्चा जब मैदान में खेलता है तो वह केवल शरीर को मजबूत नहीं करता, बल्कि टीमवर्क, अनुशासन, नेतृत्व, हार-जीत और सामाजिक व्यवहार भी सीखता है।
जब वह कहानी की किताब पढ़ता है तो उसकी कल्पनाशक्ति विकसित होती है।
जब वह शिक्षक से सवाल करता है तो उसमें जिज्ञासा पैदा होती है।
जब वह दोस्तों के साथ बातचीत करता है तो उसके सामाजिक कौशल विकसित होते हैं।
इन सभी चीजों का कोई डिजिटल विकल्प पूरी तरह नहीं हो सकता।
स्कूलों और अभिभावकों को तय करनी होगी सीमा
यह कहना उचित नहीं होगा कि तकनीक पूरी तरह खराब है। डिजिटल शिक्षा ने अनेक बच्चों के लिए ज्ञान के नए रास्ते खोले हैं। समस्या तकनीक नहीं, उसका असंतुलित इस्तेमाल है।
स्कूलों को बच्चों की उम्र के अनुसार स्क्रीन टाइम और डिजिटल गतिविधियों की स्पष्ट सीमा तय करनी चाहिए। छोटे बच्चों के लिए किताब, खेल, कला, संगीत, प्रयोगात्मक शिक्षा और शिक्षक-विद्यार्थी संवाद को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
अभिभावकों को भी यह समझना होगा कि बच्चे को चुप कराने या व्यस्त रखने के लिए मोबाइल देना आसान उपाय है, लेकिन यह आदत आगे चलकर समस्या बन सकती है।
हमें तय करना होगा कि हम बच्चों को क्या दे रहे हैं
हम अपने बच्चों को आधुनिक शिक्षा देना चाहते हैं या उन्हें छोटी उम्र में ही स्क्रीन का आदी बनाना चाहते हैं?
हमें तकनीक से बच्चों को दूर नहीं करना है, बल्कि तकनीक का गुलाम बनने से बचाना है।
स्कूलों का उद्देश्य केवल परीक्षा में अच्छे अंक दिलाना नहीं, बल्कि ऐसे बच्चे तैयार करना होना चाहिए जो सोच सकें, सवाल पूछ सकें, कल्पना कर सकें, संवाद कर सकें और समाज के साथ जिम्मेदारी से जुड़ सकें।
बच्चों के हाथ में मोबाइल देने से पहले हमें यह सोचना होगा कि कहीं हम उनके हाथ से किताब, खेल, बातचीत और उनका बचपन तो नहीं छीन रहे हैं।
तकनीक शिक्षा की सहायक बने, बच्चों के बचपन की मालिक नहीं।
— अज़हर उमरी
वरिष्ठ पत्रकार
