जयपुर हाउस और राजा जय सिंह के डेरे से जुड़ा है शिवाजी महाराज के आगरा प्रवास का इतिहास, स्मारक बनाने से पहले ऐतिहासिक तथ्यों की जांच की मांग
आगरा। छत्रपति शिवाजी महाराज के आगरा प्रवास से जुड़े ऐतिहासिक स्थल को लेकर विवाद सामने आया है। इतिहास से जुड़े विषयों पर अध्ययन करने वाले कपिल बाजपेई ने दावा किया है कि मीना बाजार स्थित कोठी का छत्रपति शिवाजी महाराज से कोई संबंध नहीं था और उनके नाम पर वहां स्मारक बनाने से पहले ऐतिहासिक तथ्यों की गहन जांच की जानी चाहिए।
कपिल बाजपेई के अनुसार, शिवाजी महाराज वर्ष 1666 में औरंगजेब के दरबार में आगरा आए थे। राजा जय सिंह ने दक्षिण में पुरंदर के किले पर शिवाजी महाराज से वार्ता के बाद उन्हें औरंगजेब के दरबार में जाने के लिए तैयार किया था। उन्होंने अपने पुत्र राम सिंह को शिवाजी महाराज की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी दी थी।

बाजपेई का कहना है कि आगरा पहुंचने के बाद दरबार में मनसबदारी को लेकर बात नहीं बनी और राम सिंह शिवाजी महाराज को अपने डेरे पर लेकर आए। उनके अनुसार, शिवाजी महाराज के आगरा प्रवास और बाद में वहां से निकलने की घटना को जयपुर हाउस और जयपुर राज्य की तत्कालीन व्यवस्था के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
उन्होंने बताया कि जयपुर हाउस के गेट पर 1658 का एक शिलालेख भी मिला था। इसके आसपास जयसिंहपुरा बसा था, जहां जयपुर राज्य की सेना का ठिकाना होने की बात कही जाती है।
बाजपेई के मुताबिक, राजा जय सिंह की कोठी के प्रभारी मथुरा निवासी मानाराम चौबे थे। उनका दावा है कि राजा जय सिंह के निर्देश पर मानाराम चौबे ने शिवाजी महाराज को आगरा से मथुरा पहुंचाया, जहां उन्हें चौबिया पाड़ा में लगभग 20 दिन तक सुरक्षित रखा गया। इसके बाद शिवाजी महाराज के मथुरा से बनारस होते हुए महाराष्ट्र पहुंचने की बात कही जाती है।
उन्होंने यह भी दावा किया कि मानाराम चौबे को बाद में महाराष्ट्र बुलाया गया था और इससे संबंधित उल्लेख शिवाजी महाराज के लिखे एक पत्र में मिलता है, जो उनके अनुसार कोल्हापुर संग्रहालय में सुरक्षित है। हालांकि इस दावे से जुड़े मूल दस्तावेजों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
बाजपेई ने शिवाजी महाराज के आगरा से निकलने की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय मिठाई और फलों के वितरण के लिए टोकरियों का इस्तेमाल किया जाता था। उनके अनुसार, गोकुलपुरा के कारीगरों ने इन टोकरियों को तैयार किया था और बाद में इन्हीं टोकरियों के माध्यम से शिवाजी महाराज के निकलने की घटना को इतिहास में बताया गया।
उन्होंने कहा कि जयपुर हाउस के निकट शाही मस्जिद, लोहामंडी और बोदला स्थित नबी साहब की दरगाह पर फल वितरण किए जाने की स्थानीय ऐतिहासिक परंपरा भी इस घटनाक्रम से जुड़ी बताई जाती है।
कपिल बाजपेई का मुख्य दावा है कि मीना बाजार की वर्तमान कोठी का निर्माण 1837 में हुआ, जबकि शिवाजी महाराज वर्ष 1666 में आगरा आए थे। ऐसे में वर्तमान कोठी को सीधे शिवाजी महाराज के प्रवास से जोड़ना ऐतिहासिक दृष्टि से उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि शिवाजी महाराज का नाम देश के इतिहास में अत्यंत सम्मानित है। उनके नाम से जुड़े किसी भी स्थान या स्मारक के निर्माण से पहले बड़े इतिहासविदों, पुरातत्व विशेषज्ञों और अभिलेख विशेषज्ञों से तथ्यों की जांच कराई जानी चाहिए।
बाजपेई ने कहा कि राजा जय सिंह ने शिवाजी महाराज की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, इसलिए आगरा में राजा जय सिंह की प्रतिमा स्थापित किए जाने और उनके ऐतिहासिक योगदान को भी उचित स्थान दिए जाने पर विचार होना चाहिए।
उन्होंने मांग की कि मीना बाजार की कोठी को शिवाजी महाराज से जोड़कर कोई निर्णय लेने से पहले उपलब्ध शिलालेखों, पुराने नक्शों, अभिलेखों और अन्य ऐतिहासिक दस्तावेजों की विशेषज्ञों से जांच कराई जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियों के सामने इतिहास प्रमाणों के साथ प्रस्तुत हो सके।
