नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में लापता बच्चों और मानव तस्करी की समस्या लगातार गंभीर रूप लेती जा रही है। वर्ष 2015 से 2025 के बीच दर्ज आँकड़ों के अनुसार दिल्ली में कुल 5,559 बच्चे लापता हुए, जिनमें से 695 बच्चों का अब तक कोई सुराग नहीं लग पाया है। यह स्थिति न सिर्फ़ कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती है, बल्कि समाज और अभिभावकों के लिए भी गहरी चिंता का विषय बन गई है।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार लापता बच्चों की तलाश के लिए निर्धारित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) का पालन किया जाता है। इसके तहत FIR दर्ज करना, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, शेल्टर होम्स की जाँच, सोशल मीडिया और ज़िला-स्तरीय समन्वय जैसी प्रक्रियाएँ अपनाई जाती हैं। बावजूद इसके, हर बच्चे तक पहुँचना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन मामलों के पीछे मानव तस्करी नेटवर्क, झूठे नौकरी या काम के वादे, घरेलू काम, भीख मंगवाने और अवैध प्लेसमेंट एजेंसियों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। कई बार आर्थिक मजबूरी, जागरूकता की कमी और भरोसे में आ जाना बच्चों को अपराधियों के जाल में फँसा देता है।
बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि लापता बच्चों के मामलों में पहले 24 से 48 घंटे बेहद अहम होते हैं। ऐसे में माता-पिता की सतर्कता, स्कूलों की भूमिका और स्थानीय स्तर पर निगरानी तंत्र को और मज़बूत करने की ज़रूरत है।
पुलिस और प्रशासन के साथ-साथ समाज की भी ज़िम्मेदारी है कि किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत दें, बच्चों को अनजान लोगों से दूर रहने के लिए जागरूक करें और लापता होने की स्थिति में देरी किए बिना पुलिस से संपर्क करें।
विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यह केवल आँकड़ों का मामला नहीं है, बल्कि सैकड़ों परिवारों की टूटी उम्मीदों और अधूरी ज़िंदगियों की कहानी है।
राजधानी में बच्चों की सुरक्षा को लेकर अब और ढिलाई की गुंजाइश नहीं है।

